
बिलासपुर। मत्स्य पालन विभाग द्वारा पिछले वर्ष रद्द किया गया केज कल्चर प्रोजेक्ट (पिंजरे में मत्स्य उत्पादन) इस साल फिर शुरू हो रहा है। हिमाचल के जलाशयों में पानी की स्थिति का हवाला देते हुए पिछले वर्ष लगभग 13 करोड़ रुपये के इस प्रोजेक्ट को रद्द किया गया था। केंद्र से धन मिलने पर इस साल इसे वैज्ञानिक शोध के पश्चात फिर शुरू किया जाएगा। इसके लिए कोलकाता के सेंट्रल इनलैंड फिशरी इंस्टीच्यूट को जिम्मा सौंपा गया है। पहले चरण में गोबिंदसागर और पौंग डेम में प्रायोगिक तौर पर 48 पिंजरे लगेंगे।
पिछले साल केंद्र से केज कल्चर प्रोजेक्ट के तहत लगभग 13 करोड़ रुपये मंजूर हुए थे। योजना के तहत साउथ अफ्रीका की पैंगेसीसूची प्रजाति की मछली का इस वैज्ञानिक तकनीक द्वारा यहां उत्पादन किया जाना था। विभाग ने तर्क दिया कि इस प्रजाति की मछली अधिक ठंडे पानी में नहीं रहती। विभाग ने केंद्रीय मत्स्य विभाग की मंजूरी के बाद इस प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया। इसके लिए मंजूर धन से मत्स्य फार्मों का विस्तार और मरम्मत कार्य किया गया। इसके तहत ऊना में 6.68 और नालागड़ में 6.68 करोड़ रुपये खर्च किए गए। अब पुन: प्रोजेक्ट चलाने की योजना बनी है। अब इस प्रोजेक्ट पर साउथ अफ्रीका की मछली की बजाए यहां की भौगोलिक स्थितियों में टिकने वाली कॉमनकार्प आदि मछलियां डाली जाएंगी। विभाग के निदेशक डा. गुरुचरण सिंह ने इसकी पुष्टि की है। अब प्लानिंग के तहत कार्य किया जाएगा। इसके लिए 3.34 करोड़ मंजूर हुए हैं। धनराशि आते ही सेंट्रल इनलैंड फिशरी इंस्ट्रीच्यूट कोलकाता को दी जाएगी। यही संस्थान यहां आकर शोध कार्य करेगा। इसके तहत गोबिंदसागर और पौंग दोनों में 24-24 पिंजरे लगाए जाएंगे। छह मीटर लंबे एवं चार-चार मीटर ऊंचे एवं चौड़े इन पिंजरों के जरिए मत्स्य उत्पादन को बढ़ावा देने की योजना है। इसके तहत एक पिंजरे में दो टन तक मत्स्य उत्पादन होगा। पहले यह प्रोजेक्ट प्रायोगिक तौर पर शुरू होगा।
