
धारचूला (पिथौरागढ़)। हर बच्चे को बाल दिवस मनाने का मौका नहीं मिलता और हर बच्चा नृप सिंह नपलच्याल भी नहीं बनता। कई बच्चे शानदार बालपन गुजारकर भी जीवन की जटिलताओं से जूझते हैं तो कई बच्चे विपरीत परिस्थितियों से लड़ने के बाद सत्ता के शीर्ष तक पहुंचते हैं। ऐसा ही जटिल बचपन जीने के बाद उत्तराखंड के चौथे मुख्य सचिव बने थे धारचूला के गुंजी गांव के नृपसिंह नपलच्याल जो आज हमारे सूचना आयुक्त भी हैं। बाल दिवस पर उन्हीं से सुनते हैं कभी बुग्यालों में बकरियों के साथ घूमने वाला किशोर कैसे प्रदेश के सभी अधिकारियों का सिरमौर बना।
श्री नपलच्याल कहते हैं कि बचपन में बकरियों के झुंड को बुग्यालों में चराने ले जाने की याद आज भी आती है। धारचूला क्षेत्र के लोग पहले परंपरागत रूप से तिब्बत व्यापार में हिस्सा लिया करते थे। बच्चों की पढ़ाई की ओर उनका ध्यान कम रहता था लेकिन श्री नपलच्याल ने इस मिथक को तोड़कर मिसाल कायम की। वह इस क्षेत्र के प्रथम आईएएस अधिकारी थे। उत्तराखंड के मुख्य सचिव पद से रिटायर होने के बाद उनको मुख्य सूचना आयुक्त बनाया गया।
श्री नपलच्याल बताते हैं कि दो अप्रैल 1950 को नपलच्यू गांव में उनका जन्म हुआ। यह गांव आवागमन की सुविधा से नहीं जुड़ा है। शिक्षा की बड़ी कमी है। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा गुंजी स्कूल में हुई। वह बचपन में जानवरों को चराने के लिए जंगल और बुग्यालों में भी जाते थे। पिता महेंद्र सिंह नपलच्याल जानवर पालकर गुजारा करते थे। परिवार की हालत गरीब थी। फिर भी उन्होंने लक्ष्य का पीछा नहीं छोड़ा। वह डिग्री की पढ़ाई के लिए पिथौरागढ़ तथा पीजी की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद चले गए। 1972 में स्टेट बैंक में प्रोबेशनरी अधिकारी के पद पर चयन हुआ। उसी दौरान वह आईएएस की तैयारी करते रहे। 1976 में उनका भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयन हो गया। वह यूपी में वरिष्ठ पदों पर रहे। राज्य गठन के बाद उन्होंने उत्तराखंड में सेवा दी। दिसंबर 2009 में वह मुख्य सचिव नियुक्त हुए। सादगी उनके व्यक्तित्व में साफ झलकती है। वह कहते हैं कि आज भी वह हमेशा गांव आते हैं। अपनी जड़ों को वह कभी नहीं भूलना चाहते।
