
पालमपुर (कांगड़ा)। पश्चिमी सभ्यता में ढल रहे आधुनिक जमाने के इस दौर में गांवों की चौपालों में लगने वाली महफिलें और ड्रामें अब ग्रामीण सभ्यता से लुप्त हो गए हैं। कभी गांव में मेहनतकश जीवन से दिनभर थके लोग अपने मनोरंजन के लिए गांवों की चौखटों में चलने वाले स्थानीय कलाकारों के ड्रामों और महफिलों में दो पल आनंद लेते थे। अब इनकी जगह टीवी और पाश्चात्य धुनों ने ले ली है। जिससे स्थानीय कला भी घर तक ही सीमित हो गई है। पहले महफिलों में लोग दूर-दूर से आकर अपना मनोरंजन करते थे। कई घंटों तक पहाड़ी, क्लासिक फिल्मी और पुराने ठेठ पंजाबी गानों पर चलने वाले इन ड्रामों का लोग आनंद लेकर थकान से चैन की नींद लेते थे। अब यह सब खत्म है। जिसका बड़ा कारण युवाओं पर पश्चिमी सभ्यता का बढ़ता नशा दिख रहा है। अपने को इस सभ्यता में ढाल रहे युवा कभी टीवी, तो कभी मोबाइल, डीजे की धुन हो या फेसबुक पर इतना व्यस्त हैं कि उन्हें इसके लिए समय ही नहीं है। इन ड्रामों में अपनी भूमिका निभा चुके सुरेंद्र ठाकुर, त्रिलोक, सुभाष धीमान, किशोरी लाल धीमान, महेंद्र सिंह, संसार चंद धीमान, राजेंद्र राणा, कृष्ण स्याल, विजय शर्मा, कश्मीर सिंह आदि का कहना है कि आधुनिकता के इस दौर में बढ़ रहे पश्चिमी फैशन की सभ्यता ने लोक कला का नामोनिशान मिटा दिया है।
