
रानीखेत। शासन-प्रशासन की अदूरदर्शिता ही कहेंगे कि देश को आजादी दिलाने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की यहां ताड़ीखेत स्थित गांधी कुटिया राज्य बनने के बाद भी उपेक्षित है। इस धरोहर को पर्यटन सर्किट में भी शामिल करने की जरूरत नहीं समझी जा रही है। 1929 में रानीखेत प्रवास के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इसी कुटिया में तीन रातें गुजारीं और पाली पछाऊं के लोगों में आजादी के लिए जोश भरा था।
1929 में कुमाऊं भ्रमण के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी रानीखेत पहुंचे तो उनके ठहरने की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी। आजादी की लड़ाई लड़ रहे स्व. मोहन लाल साह, देव सिंह कुवार्बी, हरीदत्त कांडपाल, रामदत्त पांडे, हर गोविंद पंत, बद्रीदत्त पांडे सहित तमाम लोगों ने रातों रात ताड़ीखेत स्थित प्रेम विद्यालय परिसर में एक कुटिया बना डाली। इस कुटिया में गांधी जी तीन दिन तक रहे। पाली पछाऊं क्षेत्र से आजादी के मतवालों का उन्हें देखने के लिए हुजूम उमड़ पड़ा। गांधी जी ने लोगों में न सिर्फ आजादी के लिए जोश भरा, वरन लोगों को चर्खा, कताई बुनाई का प्रशिक्षण भी दिया। तीन दिन रहने के बाद गांधी जी कौसानी चले गए। पूर्व विधायक पूरन माहरा ने बताया कि ताड़ीखेत से पहले राष्ट्रपिता ने सैमधार जैनोली में लोगों को संबोधित किया। कुटिया को संग्रहालय का रूप देने, पर्यटन सर्किट में शामिल करने की मांग उन्होंने भी की, लेकिन अफसोस कि पहले उत्तर प्रदेश और अब उत्तराखंड बनने के बाद भी महात्मा गांधी की यह धरोहर उपेक्षित पड़ी है। दीवारों से प्लास्टर उखड़ चुका है, छत खराब हो गई है। सहायक पर्यटन अधिकारी टीएस चम्याल ने बताया कि उन्होंने तीन साल पहले कुटिया का निरीक्षण कर इसे पर्यटन सर्किट में शामिल करने का प्रस्ताव भेजा था।
