
हरिद्वार। योग गुरु स्वामी रामदेव ने कहा कि देश के कर्णधारों ने यदि स्वदेशी को अपनाया होता, तो रुपये की यह दुर्दशा न होती। दुर्भाग्य से देश के आदर्श नेता बन गए हैं, ऋषि-मुनि नहीं रहे। मौजूदा भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन किए बगैर देश का भला नहीं हो सकता।
स्वामी रामदेव मंगलवार को यहां पतंजलि विश्वविद्यालय में पतंजलि शिक्षण संस्थाओं के सामूहिक शिक्षा आयोजन को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि ज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में भारत बहुत आगे था। दुर्भाग्य से शिक्षा व्यवस्था बदल दी गई और सब कुछ गुड़गोबर हो गया। उन्होंने कहा कि देश की गाड़ी को पुन: पटरी पर लाने के लिए आचार्यकुलम को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लाया गया है। जब तक देश का चिंतन ऋषि-मुनियों का चिंतन नहीं बनेगा, तब तक स्वदेशी नहीं आएगा और भारतीय करेंसी ठोकर खाती रहेगी।
प्रमुख शिक्षाविद् प्रो. जेएस राजपूत ने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाना होगा। ज्ञान बांटने से पवित्र कोई कार्य नहीं है। ज्ञान का उपयोग सेवा के कार्यों में होना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्राचीन गुरुकुलीय परंपरा को जीवंत बनाना बहुत जरूरी है। डा. सुरेन्द्र कुशवाह ने कहा कि सिद्धांत विहीन राजनीति देश को पतन के गर्त में ले जा रही है। इतिहास से सीख लेकर शिक्षा के मूल उद्देश्यों को सामने लाना चाहिए।
संस्कृत में उद्बोधन देते हुए प्रसिद्ध विद्वान चमूकृष्ण शास्त्री ने कहा कि लोगों को अपने जीवन में भारतीय मूल्य अपनाने होंगे। दुर्भाग्य से संस्कृत को भुला दिया गया है और वेद एवं आयुर्वेद अर्थहीन होते जा रहे हैं। समाज में आई विद्रूपता इसी कारण बढ़ रही हैं। डा. वीके खंडवाल ने कहा कि आगे बढ़ना है तो स्वदेशी को अपनाना होगा। इस अवसर पर छात्रों ने अनेक कार्यक्रम प्रस्तुत किए।
