ब्लड बैंक में खून की बूंद नहीं

भले ही सरकार स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार कर लोगों को बेहतर चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने का प्रत्यन कर रही है। लेकिन हकीकत यह है कि जिले के किसी भी चिकित्सालय में एक सर्जन तक तैनात नहीं है। चिकित्सकों के आधे से अधिक पद लंबे समय से रिक्त चल रहे हैं। जिले में चिकित्सकों के स्वीकृत 196 पदों के सापेक्ष सिर्फ 66 ही कार्यरत हैं। इसमें से 35 स्थायी, 31 संविदा चिकित्सक हैं। चिकित्सकों के अभाव में जिले की स्वास्थ्य सेवाएं भगवान भरोसे संचालित हो रही हैं।

केस -1
24 अगस्त की रात जिला चिकित्सालय बौराड़ी में धारकोट गांव की एक गर्भवती महिला को उपचार नहीं मिलने से एक नवजात की दुनिया में आने से पहले ही मौत हो गई थी। क्षेत्र की धारकोट, रजाखेत और नंदगांव के अस्पतालों में चिकित्सक नहीं होने से महिला को जिला चिकित्सालय लाया गया था।

केस -2
20 जनवरी को प्रतापनगर के खोलगढ़ गांव की एक गर्भवती महिला का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में डाक्टरों ने प्रसव कराने से इनकार कर दिया। चिकित्सालय से लौटते वक्त महिला ने उसी दिन लंबगांव में सड़क पर बच्चे को जन्म दिया। अगले ही दिन बच्चे की मौत हो गई।

केस -3
31 दिसंबर 2011 को भिलंगना सुनार गांव की एक गर्भवती महिला को प्रसव कराने जब परिजन देहरादून ले जा रहे थे तो चंबा में कार दुर्घटनाग्रस्त होने से गर्भवती महिला समेत परिवार के चार सदस्यों की अकाल मौत हो गई थी।

नई टिहरी। जिला चिकित्सालय बौराड़ी में तीन साल पूर्व बन चुके ब्लड बैंक में खून की बूंद तक नहीं है। खून के जरूरतमंदों को इसकी व्यवस्था के लिए देहरादून, श्रीनगर तक दौड़ लगानी पड़ रही है। समय पर खून नहीं मिलने पर कई बार हादसों के गंभीर घायलों की जान तक चली गई है। लेकिन स्वास्थ्य महकमे को इससे कोई सरोकार नहीं है। विभाग ने ब्लड स्टोरेज के लिए आवश्यक उपकरण तक नहीं खरीदे, इससे ब्लड बैंक सूना है। स्वास्थ्य महकमा ब्लड बैंक संचालित करने के लिए दो साल से आवेदन करने का हवाला देकर अपना पल्ला झाड़ रहा है।
जिला चिकित्सालय बौराड़ी में 18.85 लाख खर्च कर बनाए गए ब्लड बैंक भवन में तीन वर्ष बाद भी इसमें जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल स्थिति से अधिकतर मरीज जिला चिकित्सालय बौराड़ी का ही रुख करते हैं, लेकिन यहां भी सर्जन जैसे महत्वपूर्ण चिकित्सक की नियुक्ति नहीं होने से मरीजों के सामने बाहरी अस्पतालों में महंगा इलाज कराने की मजबूरी बनी है। समस्या से छुटकारा पाने के लिए जिला अस्पताल में ब्लड बैंक भवन का निर्माण किया गया था। लेकिन स्थिति यह है, कि तीन वर्ष बाद भी बैंक संचालित करने के लिए जरूरी उपकरण तक नहीं खरीदे जा सके हैं। जिले में कही भी ब्लड बैंक नहीं है। ऐसी स्थिति में किसी रोगी को खून की जरूरत पड़ने पर परिजनों को देहरादून या श्रीनगर जाना पड़ता है।

कोट
मरीजों के लिए ब्लड यूनिट की खपत सर्जन पर निर्भर करता है। जिले में ब्लड बैंक नहीं होने से निश्चित रूप से लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। चिकित्सकों की कमी पूरे देश में बनी है। – डा. एसपी अग्रवाल, सीएमओ टिहरी

कोट
जिले की स्वास्थ्य सेवाएं पटरी से उतरी है। लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ नहीं मिल रहा है। यदि ब्लड बैंक का संचालन नहीं होना है तो भवन निर्माण पर लाखों की धनराशि क्यों खर्च की गई। – दिनेश डोभाल, जिलाध्यक्ष उद्योग व्यापार मंडल टिहरी

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