क्रांति के लिए उठे कदम आजादी के बाद रुके

लैंसडौन। क्रांति की चिंगारी दिल में लिए लैंसडौन के क्रांतिकारियों में पेशावर कांड के बाद शोला धधकने लगा था। देश की आजादी के लिए शुरू किया गया कारवां बढ़ता ही जा रहा था। इनमें कई आजादी के मतवालों को अंग्रेजी शासन ने जेलों में ठूंस दिया, लेकिन यह सिलसिला बढ़ता ही चला गया।
वर्ष 1930 में लैंसडौन के बलदेव सिंह आर्य को 18 वर्ष की आयु में सरकार विरोधी भाषण देने पर 18 महीने की सजा हुई। 1932 में फिर आंदोलन में सक्रिय रहने पर छह महीने की सजा और 200 रुपये जुर्माना लगाया गया। रुपचंद्र वर्मा को चार जनवरी 1941 को सत्याग्रह आंदोलन में सक्रिय पर एक साल की सजा और 25 रुपये जुर्माना लगा। जुर्माना न देने के कारण उनको छह माह की अतिरिक्त सजा काटनी पड़ी । दूसरी तरफ भैरवदत्त धूलिया ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। उन्होंने अपने मित्र योगेश्वर प्रसाद धूलिया की मदद से मुंबई से हनुमान चालिसा के छद्म नाम से ‘अंग्रेजों को हिंदुस्तान से निकाल दो’ नामक पुस्तक प्रकाशित करवाई। उन्होंने पुस्तक का वितरण गढ़वाल में करवाया। आठ नवंबर 1942 को गिरफ्तार होने के दो दिन बाद 10 नवंबर को ही कोटद्वार अदालत ने उनको विद्रोह करने का दोषी मानते हुए तीन साल की सजा सुनाई। बागियों को शरण देने के अपराध में चार साल अतिरिक्त सजा सुनाई। इस तरह उनको सात साल की सजा हुई। 1930 में लैंसडौन के 33 क्रांतिकारियों को तीन से छह महीने के लिए जेल भेजा गया। इसमें नैनसिंह, छवाणसिंह, विष्णुरावत, धनीराम, देवराम जोशी, प्रताप नेगी, जगमोहन नेगी आदि शामिल थे।

विशेष कालकोठरी में डाला था।
– भक्त दर्शन को अंग्रेज सरकार केे खिलाफ आंदोलनों में भाग लेने पर 1930, 41, 42 और 44 में अंग्रेज सरकार ने जेल में डाला। कारावास के अंदर देशभक्ति गीत गाने पर उनको विशेष कालकोठरी में डाल दिया गया था। 10 अगस्त 1942 को ब्रिटिश सरकार विरोधी गतिविधियों में सक्रिय रहने पर छात्र देवेंद्र सनवाल को गिरफ्तार किया गया। उनको जिला जेल बिजनौर भेजा गया जहां पर दोहरी चारदीवारी के अंदर रखा गया। इसके अलावा देवीदत्त सनवाल, दामी जोशी, विद्यादत्त बहुखंडी, पंडित आदित्य राम दुदपुड़ी भी आजादी के लिए जेल गए थे।

गांधी पार्क में फहराया गया तिरंगा
– देश को अंग्रेजी दास्तां से आजादी मिलते ही 14-15 अगस्त की मध्य रात्रि 12:30 पर गांधी चौक पर तिरंगा फहराया गया। भक्तदर्शन ने यह ध्वजारोहण किया था। आकाश तालियों से गुंजायमान हो गया था। भारत माता की जय का उद्घोष चरम पर था। इस समारोह के प्रत्यक्षदर्शी चौथमल खंडेलवाल उस लम्हे को याद कर भावविभोर हो जाते हैं।

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