
अल्मोड़ा। लंबे समय से देखरेख के अभाव में 425 साल पुराना अल्मोड़ा कलक्ट्रेट स्थित ऐतिहासिक राम शिला मंदिर पीपल के पेड़ की वजह से जीर्ण-शीर्ण स्थिति में पहुंच गया है। उचित संरक्षण नहीं होने से मंदिर एक ओर झुक गया है इससे मंदिर का मूल स्वरूप भी प्रभावित होने लगा है। पर्यटन विभाग ने वर्तमान में पांच लाख रुपये से मंदिर के सौंदर्यीकरण का काम शुरू किया है, लेकिन यह धनराशि खर्च होने के बाद भी इस विरासत के संरक्षण पर संशय है।
राम शिला मंदिर का निर्माण 1588 में कुमाऊं के चंदवंशीय राजा रुद्रचंद ने कराया। नागर शैली में बना मंदिर मध्यकालीन वास्तु का उत्कृष्ट नमूना है। मंदिर की दीवारों पर देव प्रतिमा उकेरी गई हैं। मंदिर समूह के केंद्रीय कक्ष में पत्थर पर चरण पादुकाएं हैं। लोग इनका पूजन भगवान राम की पादुकाओं के रूप में करते हैं। रामनवमी पर मंदिर में पूजा अर्चना करने के लिए सैकड़ों श्रद्धालु पहुंचते हैं।
विरासतों के संरक्षण की जिम्मेदारी केंद्र और राज्य के अधीन पुरातत्व विभागों पर है। इस मंदिर को किसी विभाग ने संरक्षण में नहीं लिया है। मंदिर के मध्य में विशाल पीपल का वृक्ष है। इस पेड़ की गोलाई बढ़ने और जड़ों के फैलाव से मंदिर एक ओर झुक गया है। इससे मंदिर की दीवारों और शिखर को खतरा बना हुआ है। मंदिर की दीवारों में दरारें भी आ गई हैं। अधिकारियों के अलावा मंत्री, सांसद, विधायक, धार्मिक और विभिन्न राजनैतिक संगठनों से जुड़े लोग कई बार कलक्ट्रेट आते हैं, लेकिन मंदिर के संरक्षण के प्रति उदासीन हैं। जिससे यह मंदिर क्षतिग्रस्त होने की कगार पर पहुंच गया है।
पर्यटन विभाग ने मंदिर के सौंदर्यीकरण के लिए पांच लाख रुपये स्वीकृत किए हैं और काम शुरू हो गया है। स्वीकृत धनराशि से आरईएस फर्श, चहारदीवारी के अलावा मंदिर प्रांगण में छत डाली जानी है, परंतु पीपल के पेड़ से मंदिर को पहुंच रही क्षति रोकने के लिए कोई योजना नहीं है। भले ही पांच लाख रुपये की धनराशि खर्च होने के बाद मंदिर प्रांगण और फर्श चमकने लगे लेकिन मूल स्वरूप के जीर्णोद्धार की फिलहाल कोई उम्मीद नहीं है।
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संरक्षण की किसी विभाग के पास नहीं जिम्मेदारी
अल्मोड़ा। पुरातत्व विभाग के अन्वेषण सहायक सीएस चौहान ने बताया कि यह मंदिर केंद्रीय और राज्य पुरातत्व विभाग में सेे किसी के भी अधीन नहीं है। काफी समय पहले मंदिर को संरक्षण में लेने की कार्रवाई हुई थी, परंतु जनविरोध के चलते मामला ठंडे बस्ते में चला गया। उन्होंने बताया कि पीपल के पेड़ के मोटाई बढ़ने और जड़ों के फैलाव से इस विरासत को नुकसान पहुंच रहा है, लेकिन धार्मिक आस्था के चलते पीपल के पेड़ को हटाना भी संभव नहीं है।
