
पिथौरागढ़। बात चंद हफ्ते पहले की है। जिले में एक बडे़ नेता के बेटे ने एक दरोगा को ड्यूटी के दौरान बेइज्जत किया। पर चाह कर भी दरोगा अपने ही थाने में इस हरकत के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज नहीं करा सका। दबाव के बाद मामले में समझौता हुआ। यह छोटा उदाहरण राजनीति के अपराधीकरण की बड़ी व्यथा को बताने को काफी है।
राजनीति के अपराधीकरण को लेकर करीब दो दशक पहले पूर्व केंद्रीय गृह सचिव एनएन बोहरा के नेतृत्व में कमेटी बनी थी। जिसकी सिफारिशों को नहीं माना गया। और अब सर्वोच्च अदालत ने विधायिकाओं को दागियाें से मुक्त करने के लिए एक शुरुआत की थी। पर दो साल से अधिक सजा काट चुके लोगों की सदस्यता रद्द करने अथवा जेल में बंद नेताओं को चुनाव लड़ने से वंचित करने की उसकी मंशा पर सभी दलों ने वीटो लगा दिया है।
लोगों में सियासत के इस कदम पर नाराजगी है। अर्जुन एवार्डी हरिदत्त कापड़ी कहते हैं कि अदालत की व्यवस्था राजनीति में गंदगी की सफाई का बेहतरीन मौका था। पर यह सफाई उन्हें मान्य नहीं। दुकानदार नफीस अहमद कहते हैं कि बेहतर तो यह होता कि सियासी दल अपराधी छवि वाले शख्स को टिकट ही नहीं देते। पर यहां तो वे मामले को तकनीकी व्याख्या में उलझा कर अपराधियों का संरक्षण करते दिख रहे हैं।
जिला अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष एमसी भट्ट कहते हैं कि सर्वोच्च अदालत ने अपराध पर रोक के जरिए सियासत में सुधार और व्यवस्था को बेहतर करने की पहल की थी। पर दलों ने यह ऐतिहासिक मौका गंवा दिया। एडवोकेट भट्ट का कहना है कि सियासत को दागदार बचाने के लिए सख्त कदम वक्त की मांग है।
