आंख नम पर सीना गर्व से चौड़ा

धर्मशाला। …शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले, वतन पर मिटने वालों का बस यही निशां होगा। पाकिस्तानी घुसपैठियों के साथ भारत के विजयी कारगिल आपरेशन के जांबाज सैनिकों की शहादत पर आज जहां हरेक आंख नम है तो सीना गर्व से चौड़ा भी।
परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बतरा, कैप्टन सौरभ कालिया हों या फिर ग्रेनेडियर सुरजीत सिंह सहित अन्य जांबाज सैनिक। इनके कदमों की थर्राहट सेे दुश्मनों के दिल दहल उठते थे। कारगिल विजय दिवस पर हिमाचल के इन वीर सपूतों को उनकी शहादत पर शुक्रवार को धर्मशाला सलाम करेगा। धर्मशाला में स्थित प्रदेश के एकमात्र शहीद स्मारक में इस महत्वपूर्ण दिवस पर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। इस शहीद स्मारक में अब तक भारत के साथ विभिन्न युद्धों में शहीद हुए 1376 जवानों के नाम स्वार्णक्षरों में अंकित हैं। कारगिल आपरेशन में जहां देश के 527 वीर जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी उनमें हिमाचल के 52 वीर जवानों में से 15 जवान कांगड़ा जिला से संबंध रखते हैं। इनमें कैप्टन विक्रम बत्तरा एवं कै. सौरभ कालिया पालमपुर से, ग्रेनेडियर विजेंद्र सिंह देहरा से, नायक ब्रह्म दास नगरोटा से, राइफल मैन राकेश कुमार गोपालपुर से, राइफलमैन अशोक कुमार एवं नायक वीर सिंह जवाली से, नायक लखवीर सिंह, राइफलमैन संतोष सिंह और राइफलमैन जगजीत सिंह नूरपुर से, हवलदार सुरेंद्र सिंह, ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह ज्वाली से, राइफलमैन जंग महत धर्मशाला से, ग्रेनेडियर सुरजीत सिंह देहरा और नायक पद्म सिंह इंदौरा से संबंध रखते थे, जिन्होंने कारगिल आपरेशन में घुसपैठियों को खदेड़ने में अदम्य साहस का परिचय दिया। शहीद स्मारक समिति के अध्यक्ष कर्नल जयगणेश ने बताया कि नौंवी कोर के जीओसी ले. जनरल प्रवीण बख्शी शहीदों को भावभीनी श्रद्धांजलि देंगे।

परमवीर चक्र विजेता की नहीं बदली प्रतिमा
टाइगर हिल फतह कर जान दी थी विक्रम बतरा ने
शहीदों पर घोषणाओं पूरी न होन से परिजन दुखी
बनूरी गांव का नाम नहीं बदला गया शहीद के नाम
अमर उजाला ब्यूरो
पालमपुर (कांगड़ा)। देश की सीमाओं पर अपनी जान की बाजी लगाने वाले पालमपुर के शहीदों की गाथा सुनकर लोगों की आंखों में आज भी बरबस गौरव के आंसू निकल आते हैं। पालमपुर के शहीद कैप्टन सौरभ कालिया, कैप्टन विक्रम बतरा व मेजर सुधीर वालिया ने कारगिल युद्ध में अपने साहस का ऐसा पराक्रम दिखाया था, जिससे पालमपुर का सिर प्रदेश में ही नहीं बल्कि देश में भी ऊंचा हुआ।
सात जुलाई को टाइगर हिल की 4875 चोटी को फतह कर अपनी जान देने वाले कैप्टन विक्रम बतरा का नारा दिल मांगे मोर… आज भी लोगों के कानों में सुनाई देता है। कुपवाड़ा के फुर्दा के जंगलों में आपरेशन फतह में 29 अगस्त 1999 में अपनी जान की बाजी लगाने वाले मेजर सुधीर वालिया ने कारगिल युद्ध में जाने की अपने अधिकारियों से स्वयं अनुमति ली थी। जबकि कैप्टन सौरभ कालिया ने देश की सीमाओं पर आतंकवादी छिपे होने का पता लगाया था। अपनी शहादत से पालमपुर का नाम ऊंचा करने वाले इन शहीदों के परिजनों को आज भी कई बातों को लेकर वह मलाल है, जो उन्हें चैन से जीने नहीं देता। परमवीर चक्र विजेता शहीद कैप्टन विक्रम बतरा की पालमपुर में प्रतिमा तो बना दी गई, लेकिन इस प्रतिमा का चेहरा ठीक से शहीद के चेहरे से मिलता ही नहीं। पिता जीएल बतरा ने इसे बदलने की मांग की थी, लेकिन यह प्रतिमा आज तक नहीं बदली गई है। जबकि पालमपुर में लगी परमवीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ व कैप्टन विक्रम बतरा की प्रतिमाओं की देखभाल सही तरीके से नहीं हो रही है। वहीं मेजर सुधीर वालिया के पिता रुलिया राम का कहना है कि आज तक उनके गांव बनूरी का नाम शहीद मेजर सुधीर के नाम पर नहीं रखा गया व गांव में उनकी प्रतिमा भी नहीं लगाई है।

22 साल की उम्र में शहीद हुए सुरजीत
देहरागोपीपुर (कांगड़ा)। उपमंडल देहरा के कारगिल युद्ध के दूसरे शहीद सुरजीत सिंह डढवाल गांव चुधरेड़ (लोअर सुनहेत) के रहने वाले थे। वे 25 जुलाई 1999 कोे कारगिल के द्रास सेक्टर में आतंकियों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए थे। उनका पार्थिव शरीर 27 जुलाई को
उनके गांव चुधरेढ़ पहुंचा था। शहीद सुरजीत सिंह 18 साल की उम्र में ही 16 ग्रेनेडियर में भरती हो गए थे तथा 22 साल की उम्र में ही शहीद हो गए। शहीद के भाई संजीव डढवाल ने बताया कि सरकार ने जो घोषणाएं की थीं वह पूरी हो चुकी हैं।

कारगिल के पहले शहीद पर घोषणा आज भी अधूरी
बनखंडी से बणे दी हट्टी सड़क अभी तक नहीं हुई पक्की
देहरागोपीपुर (कांगड़ा)। कारगिल युद्ध को हुए 14 वर्ष का समय बीत चुका है। लेकिन हैरानी की बात हैकि एक पूरा दशक बीत जाने के उपरांत भी शहीद बजिन्द्र सिंह के नाम पर बन रही बनखंडी-बणे दी हट्टी-नंदलू सड़क आज भी अधूरी है।
आज भी शहीद के गांव नंदलू के लोग इस सुविधा से वंचित हैं। शहीद बजिन्द्र सिंह प्रदेश के पहले कारगिल शहीद थे, जिनकी पार्थिव देह सबसे पहले प्रदेश में पहुंची थी। उस समय भी राजनीतिज्ञों की उदासीनता के चलते शहीद बजिन्द्र सिंह को वह सम्मान नहीं मिला जिसके वह हकदार थे। सेना व प्रशासन के अलावा प्रदेश सरकार का कोई भी नुमाइंदा शहीद के अंतिम संस्कार में नहीं पहुंचा था। इसे लेकर तब जनता में काफी बवाल मचा था। उसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल शहीद के गांव पहुंचे तथा श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए देहरा उपमंडल के दुर्गम गांव नंदलू के लिए आठ किमी लंबा शहीद बजिंद्र सिंह मार्ग को बनाने का ऐलान किया। यह घोषणा वर्ष 1999 में हुई थी। इस सड़क के निर्माण से बणे दी हट्टी, तलपा, मीठी आंवल और नंदलू गांव सहित करीब आधा दर्जन गांवों के हजारों लोगों को फायदा होना था। इस मार्ग का कुछ हिस्सा वन विभाग की भूमि होने के चलते अटका हुआ है। हालांकि लोनिवि ने बणे दी हट्टी से लेकर शहीद के घर तक की कुछ सड़क को पक्का कर दिया है। लेकिन शेष सड़क को पक्का होने का आज भी इंतजार है। शहीद की माता संतोष कुमारी ने कहा कि वैसे तो प्रदेश सरकार ने हर जरूरी सहूलियत मुहैया करवाई है। यदि शेष सड़क भी जल्द बन जाती लोगों को काफी फायदा पहुंचेगा।

सौरभ के परिजन कर रहे फैसले का इंतजार
अमानवीय यातनाओं से हुई थी सौरभ की मौत
कारगिल युद्ध में निकले थे आंतकियों का पता लगाने
सुप्रीट कोर्ट में मामला जाने से बंधी न्याय की आस
विनोद राणा
पालमपुर (कांगड़ा)। देश की सरहदों में छुपे आतंकवादियों का पता लगाने के लिए अपनी टीम के साथ निकले कैप्टन सौरभ व उसके साथियों को जो अमानवीय यातना दी गई थी, उसे सुन कर आज भी हर किसी की रूह कांप उठती है। शहीद सौरभ कालिया व उनके साथ पांच सदस्यीय टीम ने ही देश की कारगिल पहाड़ियों में छुुपे आतंकवादियों का पता लगाया था। टीम का नेतृत्व सौरभ कालिया कर रहे थे।
लेकिन आतंकवादियों ने देश के इस आर्मी अफसर को जिस तरह से अमानवीय यातनाएं दीं, उसका इंसाफ आज तक सौरभ के परिजनों को नहीं मिल पाया। जबकि शहीद कैप्टन सौरभ कालिया का शरीर कारगिल युद्ध में क्षत विक्षत हालत में मिला था। लेकिन अब मामला सुप्रीमकोर्ट में जाने से शहीद के परिजनों पिता डा. एनके कालिया व माता विजया कालिया को न्याय मिलने की आस जग गई है। इनका कहना है कि अब भले देरी से ही सही लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट में जाने से न्याय की किरण जग गई है। 15 मई 1999 को सौरभ अपने अन्य साथियों के साथ कारगिल की पहाड़ियों में छुपे आतंकवादियों की टोह लेने गए थे। उसके बाद 9 जून को उनका क्षत विक्षत शरीर भारतीय सेना को मिला था। पालमपुर पहुंचे अपने लाडले का शव का जो हाल परिजनों ने देखा था। उसे देख हर कोई दंग रह गया था। फिर भी सौरभ की साहसी माता विजया कालिया ने देश की सरहदों पर प्राण दे चुके अपने बेटे शहीद सौरभ की अर्थी को कंधा दिया तो हर कोई शहीद की माता के हौसले को नमन कर रहा था। अब शहीद की अमानवीय तरीके से हुई मौत के मामले पर फैसले का हर किसी को इंतजार है।

Related posts