
हल्द्वानी। देश में रोज सैकड़ों लोग मरते हैं। उत्तराखंड की आपदा में ही हजारों लोग मर गए। हर मौत पर दु:ख होता है, लेकिन ऐसे मरने वाले कम होते हैं जिनकी चर्चा उनके जाने के बाद भी रहती है। आपदा की शिकार जयकोट (धारचूला) की पूजा सिंह ऐसे लोगों में शामिल हो गई है, जिसे याद करने की वजह हमारे पास हमेशा रहेगी। सात जुलाई को चल गांव से शुरू हुई पूजा और मौत की लड़ाई पिथौरागढ़, हल्द्वानी के अस्पतालों में रुकते हुए दिल्ली एम्स तक पहुंची। आखिर मौत से कौन जीता? पूजा ने भी 16 दिन बाद दम तोड़ दिया, लेकिन जाते-जाते पूजा अपनी आंखें दान कर दिखा गई कि मौत के भी मायने होते हैं।
पूजा को आपदा पीड़ित कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि वह इससे लड़ी थी और लड़ने वाला कभी पीड़ित नहीं होता। मूलरूप से धारचूला के जयकोट की रहने वाली पूजा की आपदा से मुलाकात अपनी दीदी के घर चल गांव में हुई। सात जुलाई को बहन के परिवार के साथ आपदा से बचने के लिए चल गांव से धारचूला आ रही पूजा का पैर फिसल गया और वह करीब 20 मीटर गहरी खाई में जा गिरी। इससे उसके शरीर का निचला हिस्सा सुन हो गया और गले की हड्डी टूट गई, लेकिन पूजा नहीं टूटी। वह जिंदगी की चाह में तीन दिन तक धारचूला में मौत से लड़ती रही। साधन विहीन प्रशासन को पूजा के इस संघर्ष की खबर तीन दिन बाद लगी। इसके बाद पूजा को एयरलिफ्ट से पिथौरागढ़ लाया गया, लेकिन यहां भी बेबस स्वास्थ्य सुविधाएं पूजा की कोई मदद नहीं कर सकी और मौत उसके करीब आती गई।
13 जुलाई के दिन पूजा को सुशीला तिवारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। कुमाऊं का सबसे बड़ा शहर और मेडिकल हब भी किसी काम नहीं आया। पूजा करीब छह दिन यहां मौत से लड़ती रही और लाचार व्यवस्था मौत का इंतजार करती रही। पूजा के आपरेशन के लिए उपकरण न होने के कारण उसे 19 जुलाई को दिल्ली एम्स रेफर कर दिया गया। इतने अस्पतालों से गुजरने के बाद भी पूजा हिम्मत नहीं हारी, क्योंकि वह जीना चाहती थी। उसने देखा था सपना अपने परिवार की गरीबी से लड़ने का, लेकिन वह यह लड़ाई जीतती, इससे पहले उसे देखनी पड़ी आपदा। अब जिन आंखों से पूजा ने आपदा देखी उन आंखों से कोई दुनिया देखेगा। इस नेक काम के लिए हमें पूजा के पिता फल सिंह और मां का भी शुक्रिया अदा करना होगा। क्योंकि उनकी रजामंदी से ही आठ में पढ़ने वाली पूजा की आंखों से किसी के घर में नया उजाला होगा।
