चौगान से दुकानें, पार्किंग हटाने के निर्देश

चंबा। स्थानीय सिविल जज सीनियर डिविजन अपर्णा शर्मा की अदालत ने ऐतिहासिक चौगान में बनाई गई दुकानों और पार्किंग को किसी अन्य जगह पर शिफ्ट करने के निर्देश दिए हैं। इसके अलावा भविष्य में यहां पर किसी प्रकार की दुकान और अस्थायी/स्थायी ढांचा बनाकर, पार्किंग के तौर पर या अन्य किसी प्रकार से व्यावसायिक गतिविधि चलाने पर भी रोक लगा दी है। वादी पक्ष से मिली जानकारी के अनुसार कोर्ट ने 28 जून को यह निर्णय सुनाया था, जिसकी जजमेंट कापी आठ जुलाई को जारी हुई है। वादी पक्ष की ओर से देविंद्र सिंह पुत्र लाजपत सिंह मोहल्ला बनगोटू और जतिंद्र सिंह पुत्र सुखदेव निवासी मोहल्ला द्रोभी ने चौगान के ऐतिहासिक स्वरूप को बिगाड़ने और जिला प्रशासन तथा नगर परिषद पर इसका व्यावसायिक उपयोग करने को लेकर आठ जून 2005 को प्रदेश सरकार, उपायुक्त चंबा, नगर परिषद चंबा और जनसाधारण के खिलाफ केस दायर किया था। इस मामले में सामने आया है कि चंबा चौगान की कुल लंबाई और चौड़ाई राजस्व रिकार्ड में 39,304 स्क्वेयर यार्ड दर्ज है। इसकी मालिक राज्य सरकार ने इसे नगर परिषद को इस्तेमाल और देखभाल के लिए दे रखा है। चौगान की वास्तविक लंबाई सर्किट हाउस चंबा से लेकर शाम सिंह अस्पताल चंबा तक थी। इसका इस्तेमाल राजा के जमाने से चंबा की जनता सैर करने, खेलने सहित धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए करती आ रही है। नगर परिषद और नगर नियोजन विभाग के नियमों की अनदेखी कर पक्की दुकानें बनाने पर कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है। वादी पक्ष ने यह बात भी कोर्ट के समख रखी थी कि चौगान को तीन हिस्सों में बांटकर चौगान नंबर तीन बनाया गया है। यहां शहरवासी किसी की मृत्यु पर शव यात्रा के दौरान रावी या साहल खड्ड तक जाते समय अर्थी को रखकर विश्राम करते थे, वहां नगर परिषद ने पार्किंग और किराये पर दुकानें बना कर दे दी हैं। इसके अलावा मिंजर मेले को व्यापारीकरण के तहत आठ दिन से बढ़ाकर 15 दिन तक चलाने की बात रखी गई थी, जिसे वादी पक्ष साबित नहीं कर पाया। कोर्ट में यह निर्णय सुनाते हुए चौगान में सिर्फ रिक्रिएशन, सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों के साथ इसे टहलने, रुकने और खेलने के लिए इस्तेमाल करने के निर्देश दिए हैं। इस निर्णय में कई तरह के ऐतिहासिक पक्ष भी रखे गए थे।
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कामर्शियल गतिविधि की नहीं थी इजाजत
हिमाचल सरकार के सहायक सचिव राजनीतिक ने चीफ कमिश्नर चंबा को 24 जनवरी 1950 में भेजी अधिसूचना के तहत चौगान के इस्तेमाल के लिए नियम बनाए गए थे। इसमें कामर्शियल गतिविधि की इजाजत नहीं थी। इस बीच प्रदेश सरकार ने 9 मार्च 1953 को जारी अधिसूचना में पाकिस्तान विभाजन के समय आए लोगों सहित चंबा के गरीब और जरूरतमंद लोगों को यहां नगर परिषद की इजाजत से लकड़ी के अस्थायी स्टाल और हटड़ी बनाकर कुछ समय के लिए बसने की इजाजत दी थी। कोर्ट ने साफ किया है कि यह इजाजत स्थायी कब्जा करके दुकानें बनाने की नहीं थी। यहां लकड़ी के स्टाल और हटड़ियां अस्थायी समयसीमा तक लगने थे, जो नगर परिषद की ओर से समय-समय पर काम करने के लाइसेंस की अवधि बढ़ाने पर निर्भर था। इस इश्यू पर सरकारी पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि सरकार ने इन अस्थायी स्टालों और हटड़ियों को टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एक्ट के तहत स्थायी कर दिया है।

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