26 वर्षों के संघर्ष के बाद मिला हक

नई टिहरी। टिहरी बांध से प्रभावित किरायेदार को 26 वर्ष के लंबे संघर्ष के बाद न्याय मिला है। भूखंड आवंटन के लिए 1986 में पैसा जमा करने के बाद 16 वर्ष तक विभाग के चक्कर काटने पर भी सुनवाई नहीं हुई तो जिला उपभोक्ता संरक्षण में वाद दायर किया। किरायेदार के पक्ष में फैसला आने के बाद पुनर्वास निदेशालय सुप्रीम कोर्ट तक गया, वहां से भी प्रभावित के पक्ष में निर्णय होने पर आखिरकार पुनर्वास निदेशालय को ढुंगीधार में प्लाट आवंटित करना पड़ा।
बांध के लिए टिहरी शहर का अधिग्रहण करते समय टिहरी बांध परियोजना कार्यालय ने 1985 से पहले निवासरत भूस्वामियों, किरायेदाराें और व्यापारियों को विस्थापन की श्रेणी में रखा था। शर्त के अनुरूप वहां बतौर किरयेदार रह रही शिक्षिका शाखा कठैत पत्नी गबर सिंह ने भी 150 वर्गमीटर भूखंड के लिए 15 मार्च 1986 को टिहरी बांध खंड दशम कार्यालय में 750 रुपये जमा कराए थे, लेकिन उन्हें भूमि नहीं दी गई। गबर सिंह ने बताया कि थकहार कर 2002 में उपभोक्ता संरक्षण में वाद दायर किया तो पक्ष में फैसला आया। उसके बाद दशम खंड राज्य उपभोक्ता आयोग से लेकर हाईकोर्ट, नेशनल कंजूमर कमीशन और सुप्रीम कोर्ट तक गया, जहां उनकी अपील खारिज की गई। सुप्रीम कोर्ट ने 2 अप्रैल 2013 को पुनर्वास निदेशक टिहरी बांध परियोजना की अपील को निरस्त करते हुए तीन माह में प्रार्थिनी को नई टिहरी में 150 वर्ग मीटर आवासीय भूखंड आवंटित करने के निर्देश दिए। जिस पर पुनर्वास निदेशालय ने शाखा कठैत को भूखंड आवंटित कर 28 जून 2013 को कब्जा देना पड़ा। उन्होंने कहा कि पनुर्वास निदेशालय ने पात्र होने के बाद भी अनावश्यक परेशान किया है। जिससे उन्हें काफी परेशानियो का सामना करना पड़ा।

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