कुदरत के कहर से बचे तो रास्ते में नेपालियों ने लूटा

हरिद्वार। रेलवे स्टेशन पर रोते, आंसू बहाते आठ बुजुर्गों की रोते-रोते आंखें सूज गई हैं। जो भी उनसे व्यथा पूछता तो वे हाथ जोड़कर उनसे कुछ न पूछने की गुजारिश करते। कहा कि एक कहर तो कुदरत ने बरपाया दूसरा कहर नेपालियों ने। कहा उनकी आंखोेें के सामने मजदूर नेपालियों ने तीन बुजुर्ग महिलाओं का सुहाग उजाड़ दिया। जेवर और पैसे भी लूट लिए।
यह कहना है केदारनाथ की यात्रा पर गये मध्य प्रदेश के यात्रियों का। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के राजनगर तहसील के गांव पहरापुरवां के रामा कुशवाहा, भागीरथी, धनवां, गोदीबाई, शांति, गजिया, वेटीबाई, दुर्जन कुशवाहा सहित कुल 66 यात्रियाें का जत्था दो बसों से ऋषिकेश से चला। आपदा पीड़ित रामा कुशवाहा ने बताया कि बस में पांच गांवों के यात्री थे। हम 11 यात्री एक ही गांव के अलग धर्मशाला में थे और बाकी अन्य धर्मशालाओं में थे। 17 जून को केदार नाथ में आयी तबाही में वे अपनी धर्मशाला से जैसे तैसे पहाड़ी की ओर भागे। केदारनाथ धाम से घनघोर जंगल के रास्ते आने लगे। भागने के चक्कर में उनके कपडों से भरे बैग भी कहीं छूट गये । लगभग तीन किलोमीटर दूर गौरीकुंड की ओर जंगल में उनका मुकाबला नेपालियों से हो गया। पांच-छह नेपालियों का झुंड उन पर टूट पड़ा और उनके पास जितने जेवर और पैसे थे सारे लूट लिए। गोदीबाई के कानों के कुंडल निकालने लगे और विरोध करने पर नेपालियों ने उसका गला दबा दिया। विरोध करने पर नेपालियों ने झुंड के छह बुजुर्गोें में से तीन को खाई में धक्का दे दिया। इसके बाद बुजुर्गों का कहीं अता-पता नहीं था। सारी रात रोते-रोते वहीं पर काटी।18 जून को जैसे तैसे गौरीकुंड की ओर आने लगे। हेलीकाप्टर से बिस्कूट के पैकेट गिराए जा रहे थे, जिन्हें हमने इकट्ठा किया। रास्ते में फिर दो नेपाली मिले और सारे बिस्कुट के पैकेट लूट ले गये। 19 जून को वे पैदल गौरीकुंड पहुंचे। 20 जून को वहां से हमें हेलीकॉप्टर से गुप्तकाशी लाया गया। 21 जून को वहां से चले तो रात को ऋषिकेश पहुंचे।

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