प्रकृति ही नहीं झूठे आश्वासनों ने भी डुबोया

उत्तरकाशी। सिविल इंजीनियरिंग से डिप्लोमा करने के बाद नौकरी न मिलने पर मोहन डबराल ने वर्ष 1994 में जोशियाड़ा झूला पुल के पास स्टेशनरी की दुकान खोली थी। 3 अगस्त 2012 की भागीरथी की बाढ़ सामान समेत पूरी दुकान बहा ले गई। लाखों का नुकसान हुआ, लेकिन सरकारी मानकों की क्या कहें, इस युवक को मदद के नाम पर धेला भी नहीं मिला।
अपनी मेहनत पर भरोसा और निचले हिस्से में करोड़ों के बाढ़ सुरक्षा कार्य शुरू करवाकर सरकारी स्तर पर किसी प्रकार का खतरा न होने का आश्वासन मिलने पर मोहन ने फिर सड़क की दूसरी ओर दुकान की शुरुआत की। नाते-रिश्तेदारों ने कर्जा देकर मोहन की मदद की। अब भागीरथी में दोबारा आई बाढ़ से उसकी दुकान बह गई। यही नहीं 50 मीटर पीछे बना उनका आवासीय भवन भी खतरे की जद में है। मानक पहले वाले ही हैं, इसलिए सरकार से मदद की उम्मीद बेमानी लग रही है।

ये भी गवां चुके आजीविका के साधन
राजा नौटियाल, कृष्ण प्रताप राणा, पारेश्वर सेमवाल, रमन सेमवाल, युवराज असवाल, विजय असवाल, संदीप पंवार, गजपाल राणा, गणेश, अवतार गुसाईं, कमल कंडियाल, आनंद गुसाईं, दिनेश उप्पल, रमेश राणा, इंद्र सिंह गुसाईं, गिरीश थपलियाल, विनोद जोशी, कलीराम गुसाईं, विजेंद्र भट्ट।

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