
पिथौरागढ़। पहली बारिश से सैकड़ों भवन ताश की पत्तों की तरह ढह कर नदियों में समा गए हैं। सीमांत के सैकड़ों परिवार तबाह हो गए हैं। बात कुछ सालों की करें तो पिथौरागढ़ जिले में जुलाई, अगस्त, सितंबर में ही आपदा आई है। इस बार जून में ही प्रकृति के रौद्र रूप से लोग सिहर उठे हैं। हमारी सरकारों ने ही लोगों को मौत के मुहाने में बिठा रखा है। आपदा प्रबंधन विभाग ने जिले के 64 गांवों को न रहने लायक घोषित किया है। इनमें से 30 गांवों को विस्थापित करने का प्रस्ताव सरकार के दफ्तरों में धूल फांक रहा है।
7 अगस्त 2009 का मंजर याद होगा, जब मुनस्यारी तहसील के ला, झेकला में भूस्खलन से 43 लोगों की जान चली गई थी। 5 सितंबर 2007 को बरम के मल्लासैम इलाके में गहरी नींद में सोए 15 लोग जिंदा दफन हो गए थे। अति संवेदनशील स्थानाें के 64 गांवों के 1200 परिवार दहशत में जी रहे हैं। बरसात में लोगों को अस्थायी रूप से अन्यत्र बसा दिया जाता है। बरसात थमी तो लोग उन्हीं घरों की ओर लौट जाते हैं। मुनस्यारी के भंडारीगांव, ला, झेकला, गिरगांव, धारचूला के स्यांकुरी, जुम्मा, गर्बा, मल्लासैण आदि गांवों में 30 से 50 मीटर लंबी दरारें पड़ी हैं।
धारचूला के 14, मुनस्यारी के 12, बेरीनाग के 3 और डीडीहाट के 1 गांव को विस्थापित किया जाना है। विस्थापित होने वाले गांवों में सबसे अधिक 115 परिवार मुनस्यारी तहसील के ला, झेकला और गिरगांव के हैं। धारचूला के जिप्ती के गर्बा तोक के 47 परिवार, स्यांकुरी के 24, जुम्मा के 29, सुवान्यूधुरा के 48, झिमागांव के 8, मल्लासैम के 29, खुमती के कटौजिया तोक के 11, तांकुल के 10, कनार के कोटला तोक के 04, साईपोलो-साईभाट के 30 परिवार विस्थापितों की श्रेणी में हैं। जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी आरएस राणा कहते हैं कि 30 गांवों का विस्थापन, 27 गांवों की पुनर्स्थापना, 7 गांवों में न्यूनीकरण कार्य किया जाना है। इसका प्रस्ताव साल 2011 में शासन को भेज दिया गया था।
