सावधान! नदी कभी न कभी खुद हटा देगी अतिक्रमण

अल्मोड़ा। नदियां किसी भी राज्य की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संपदा हैं लेकिन उत्तराखंड में नदियों को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। राजस्व विभाग, वन विभाग, प्रशासन, सिंचाई विभाग सहित किसी भी सरकारी एजेंसी को यह तक मालूम नहीं है कि नदी से कितनी दूरी तक निर्माण पर रोक है। नदियों के आसपास चाहे जितना अतिक्रमण कर लो उसे रोकने वाला कोई नहीं है और न ही अतिक्रमण करने वाले पर कोई कार्रवाई होती है लेकिन इतना जरूर है कि नदी बाढ़ का रूप धारण कर अपने इर्द गिर्द का अतिक्रमण कभी न कभी खुद ही हटा देती है, चाहे अतिक्रमण कितना ही विशाल क्यों न हो।
पिछले कुछ वर्षों में नदियों के किनारे अतिक्रमण की बाढ़ आ गई है। बागेश्वर सहित नदियों के किनारे बसे कई नगर और कस्बे इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। बागेश्वर में स्थिति यह हो गई है कि लोग सरयू नदी के भीतरी हिस्से में पिलर गाड़कर निर्माण करने लगे हैं। नदी के किनारे कई विशाल इमारतें खड़ी कर दी गई हैं। बागेश्वर में तो खुद पर्यटन विभाग ने ही नदी के भीतर की तरफ शौचालय का निर्माण कर रखा है। अल्मोड़ा-भवाली मार्ग में कोसी नदी के किनारे भी तमाम स्थानों पर भवन और दुकानें आदि बना दी गई हैं। यही स्थिति पिथौरागढ़ और अन्य जिलों की नदियों की है।
दरअसल अतिक्रमणकारियों को यह पता है कि नदियों के किनारे होने वाले निर्माण को रोकने वाला कोई नहीं है। सड़कों के किनारे के निर्माण को रोकने के लिए कम से कम नाम के लिए रोड साइड कंट्रोल एक्ट तो बना है लेकिन नदियों के किनारे निर्माण को रोकने के लिए तो कोई स्पष्ट नियम नहीं है। सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता डीसी सिंह कहते हैं कि सिंचाई विभाग की जिम्मेदारी अतिक्रमण रोकने की नहीं है। सिंचाई विभाग तो सिर्फ पानी की व्यवस्था देखता है। दूसरी तरफ अल्मोड़ा के जिलाधिकारी अक्षत गुप्ता कहते हैं कि नदियों के किनारे अवैध निर्माण रोकने की जिम्मेदारी सिंचाई विभाग अथवा वन विभाग की है। जिलाधिकारी का कहना है कि यदि सिंचाई विभाग को लगता है कि नदी के पास अतिक्रमण हो रहा है तो उन्हें प्रशासन को सूचना देनी चाहिए। बीते दिनों इस बारे में बागेश्वर के तत्कालीन जिलाधिकारी वी षणमुगम से पूछा गया तो उनका भी यही जवाब था।
नदियों के किनारे हो रहे अतिक्रमण को रोकने के लिए स्पष्ट कायदे कानून नहीं होने का फायदा अतिक्रमणकारी उठा रहे हैं लेकिन इतना जरूर है कि नदियां यह सब सहने वाली नहीं है। विशेषज्ञों का यह मानना है कि एक न एक दिन नदी 30 से 45 साल पुराने हाई फ्लड लेवल (उच्चतम बाढ़ स्तर) को दोहराती है। बाढ़ के अपने सर्वोच्च स्तर पर बहते हुए नदी विशाल अतिक्रमणों को भी बहाकर साफ कर देती है। इस बार की बाढ़ में भी उत्तरकाशी सहित नदियों के किनारे बसे कई नगरों और कस्बों में ऐसे दृश्य देखने को मिले हैं। जानकारों का यह मानना है कि इससे सबक लेते हुए शासन को नदियों के उच्चतम बाढ़ स्तर का पता लगाने के बाद इस सीमा से कम से कम 50 मीटर की दूरी तक निर्माण करने में सख्ती से पाबंदी लगानी चाहिए।

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