शिक्षा के समान अवसर देना सरकार की जवाबदेही

अल्मोड़ा। शिक्षा के निजीकरण, बाजारीकरण के खिलाफ समान शिक्षा प्रणाली लागू करने की मांग को लेकर रचनात्मक शिक्षक मंडल के तत्वावधान में जीजीआईसी में दो दिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला शुरू हो गई है। कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए अंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली के प्रो. गोपाल प्रधान ने कहा कि सबको शिक्षा के समान अवसर देने की संवैधानिक जवाबदेही से सरकार पल्ला झाड़ रही है। शिक्षा के बजट को कम किया जा रहा है।
‘वर्तमान शिक्षा के संकट और चुनौती’ विषय पर व्याख्यान देते हुए उन्होंने कहा कि 11वीं और 12वीं पंचवर्षीय योजना में शिक्षा व्यवस्था में कारपोरेट घरानों, एनजीओ और धार्मिक संगठनों ने पीपीपी मोड के जरिए घुसपैठ कर ली है। कम छात्र संख्या का बहाना बनाकर सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं। सरकार ने उच्च शिक्षा को वैश्विक बाजार में बिकाऊ माल बना दिया है।
शिक्षाविद् अनुवादक विपिन शुक्ला ने ‘शैक्षिक संकट और शिक्षकों के आंदोलन’ विषय पर कहा कि शिक्षा के निजीकरण के दुष्परिणामों के खिलाफ शिक्षक आंदोलित हैं। पूंजीवादी देशों में शिक्षा के निजीकरण के खतरनाक दुष्परिणाम सामने आए हैं। निजीकरण से फीस बढ़ रही है। सरकार राज्य में ही 2200 से अधिक स्कूल पीपीपी मोड में देने की तैयारी में है। ठेके की भर्तियों के टेंडर जारी हो रहे हैं। संचालन नीरज पंत और कैलाश डोलिया ने किया। संगठन के राज्य संयोजक नवेंदु मठपाल ने सभी का स्वागत किया।
कार्यशाला में डायट की वरिष्ठ प्रवक्ता नीलम नेगी, उपन्यासकार डा. शंभू पांडे, डा. कपिलेश भोज, राजीव जोशी, रेखा चमोली, जवाहर मुकेश, मुकेश बहुगुणा, प्रशांत कांडपाल, राजेश कुकरेती, महेश पुनेठा, विनोद बसेड़ा, दिनेश भट्ट, दिनेश कर्नाटक, विवेक पांडे, प्रेम मावड़ी, धर्मेंद्र बसेड़ा, अमित पुनेठा, हेम जोशी, सवित जनौटी, पीसी तिवारी, निर्मला लोहुमी, दीप सनवाल, डा. कपिल नयाल आदि ने विचार रखे। जीजीआईसी की छात्राओं ने स्वागत गीत गाया। नारमन लेक लेरियन, नेवर्स, रेड बैलून, आई वंडर, गांव छोड़त नाही फिल्में भी प्रदर्शित की गई।

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