
नैनीताल। इंजीनियरिंग ऐसा क्षेत्र है जिसे देश की युवा पीढ़ी अपना भविष्य मानती है। इंजीनियर बनने के लिए मशीन चलानी-बनानी आनी चाहिए, पर राजकीय पालिटेक्निक के 180 भावी इंजीनियर मशीनों को देखकर प्रयोगात्मक प्रशिक्षण लेते हैं। सरकारी संस्थान की डिग्री तो उन्हें मिल ही जाए लेकिन एक कुशल इंजीनियर बनने की राह मीलों दूर है। 1960 में प्रायोगिक प्रशिक्षण के लिए यहां 19 लेथ मशीनें स्थापित की गई थी और इनमें से 17 खराब हैं। महज दो मशीनों में 180 इंजीनियर सीखते हैं।
वक्त के साथ बदलती प्रतिस्पर्धा की दौड़ में इंजीनियरिंग का क्षेत्र बहुत तेजी से आगे निकला है। पहाड़ से इंजीनियर निकालने के लिए वर्ष 1957 में यहां पालीटेक्निक कालेज स्थापित किया गया था। 1987 में इसे राजकीय पालिटेक्निक का दर्जा मिला। मैकेनिकल ट्रेड के लिए 19 लेथ मशीनें खरीदी गई। साल दर साल रखरखाव की कमी के कारण मशीनों की हालत बदतर हो गई है। 17 मशीनें खराब पड़ी हैं और इनके पार्ट्स, गियर घिस गए हैं तथा टूट चुके हैं।
तीन बैचों के यहां लगभग 180 विद्यार्थी इंजीनियरिंग की पढ़ाई करते हैं। बीते दो वर्ष से बची मशीनों के रखरखाव पर एक भी धेला खर्च नहीं हुआ। ऐसे में भविष्य के कुशल इंजीनियरों के निकलने की बात बेमानी लगती है तो सरकार का यह संस्थान पहाड़ के युवा भविष्य के लिए धोखा भी है। कालेज की इस दुर्दशा की जानकारी भुवन सुयाल ने सूचना अधिकार अधिनियम से मांगी, तब जाकर वर्षों पुराने कालेज की दुर्दशा सामने आई है।
प्रधानाचार्य ने स्वीकारी वास्तविकता
नैनीताल। राजकीय पालीटेक्निक के प्रधानाचार्य एमएस बिष्ट ने बताया कि संस्थान के विभिन्न 8 ट्रेडों में 850 से अधिक विद्यार्थी अध्य्यनरत हैं। जिनमें से 180 प्रयोगात्मक वाले छात्र हैं। लेथ मशीनें पुरानी होने के कारण इनकी मरम्मत नहीं हो पा रही है। शासन को 1.90 करोड़ रुपये का प्रस्ताव भेजा गया है। विश्व बैंक योजना के माध्यम से संबंधित धनराशि मिलने की संभावना है।
