
नैनीताल। खुद को मित्र कहने वाली उत्तराखंड पुलिस हमेशा अपनी कार्यसंस्कृति से विवादों में रही है। जनता के बीच पुलिस की अच्छी-बुरी छवि से हर कोई वाकिफ है, पर अब राज्य की शीर्ष अदालत ने भी पुलिस को गरीबों का हितैषी नहीं माना है। बुधवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान हल्द्वानी के सीओ तथा दरोगा के साथ ही तीन कांस्टेबलों की मौजूदगी में हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि पुलिस के पास कोई गरीब एफआईआर लिखाने आता है तो उसकी सुनी नहीं जाती और उसे वापस घर भेज दिया जाता है। ये कार्यप्रणाली गलत है।
न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की एकलपीठ के समक्ष हुई सुनवाई के तहत पारिवारिक विवाद के एक मामले में हल्द्वानी निवासी प्रोफेसर आदित्य छोकर और अजय छोकर के विरुद्ध पूर्व में हाईकोर्ट ने पुलिस को यह निर्देश दिए थे कि वह इन दोनों अभियुक्तों के विरूद्ध कोई उत्पीड़नात्मक कार्रवाई न करें। बीती 30 मई 2013 को अभियुक्त और परिवादी को हाईकोर्ट में बुलाया गया। आदित्य, अजय अपने अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली और हाईकोर्ट के पूर्व सचिव सुरेश भट्ट के साथ हल्द्वानी जा रहे थे तो काठगोदाम थाना पुलिस ने उनकी कार रोकी और थाने ले आई। तब अधिवक्ताओं ने सीओ लोकजीत सिंह और एसआई नीरज भाकुनी को बताया कि मामले में दोनों अभियुक्तों के पक्ष में हाईकोर्ट ने पूर्व में अंतरिम आदेश पारित किया है, पर पुलिस ने नहीं सुनी।
उच्च न्यायालय में दायर याचिका में कहा गया कि दोनों पुलिस अधिकारियों के साथ कांस्टेबल संजय टम्टा, हरेंद्र सिंह और पंकज टाकुली ने अदालत के आदेश की अवेहलना की और अभियुक्तों के साथ ही दोनों अधिवक्ताओं को घंटों थाने में बिठाए रखा। याचिका पर सुनवाई के बाद ही सीओ लोकजीत सिंह, एसआई नीरज भाकुनी और तीनों कांस्टेबल कोर्ट के आदेश के अनुपालन में बुधवार को जब व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए तो न्यायालय ने पुलिस पर टिप्पणी की। अदालत में उन्होंने अधिवक्ताओं से माफी मांगने का प्रस्ताव दिया। पूर्व आदेशों के क्रम में इन पांचों के व्यक्तिगत शपथपत्र प्रस्तुत नहीं होने के कारण अब कोर्ट ने एक जुलाई की तिथि नियत कर शपथपत्र देने और उपस्थित रहने को कहा है। साथ ही पुलिस को अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करने को कहा गया है।
