क्लीनिकल स्टेबलिस्मेंट बिल का विरोध

हल्द्वानी। सरकार अगर आयुष डॉक्टरों के लिए भी क्लीनिकल स्टेबलिस्मेंट बिल लागू करना चाहती है तो पहले इंडिया को इंग्लैंड बनाना होगा। वहां इलाज का खर्च जितना भी हो सरकार देती है। लेकिन उत्तराखंड में 80 फीसदी बीपीएल मरीज हैं जिनको एक एमबीबीएस डॉक्टर से इलाज नहीं करवा सकती। सरकार भी उनकी मदद नहीं करती। बल्कि आयुष के डॉक्टर ऐसे मरीजों को सस्ते में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देते हैं। ये बात विश्व आयुर्वेद परिषद के प्रदेश महासचिव डॉ एनके मेहता ने कही।
डॉ मेहता नेशनल इंटीग्रेटेड मेडिकल एसोसिएशन (नीमा) के पदाधिकारियों के साथ क्लीनिकल स्टेबलिस्मेंट बिल का विरोध करते हुए मीडिया से बात कर रहे थे। उन्होंने मांग की कि इस बिल में एलोपैथिक के समान ही आयुष डॉक्टरों को रखा गया है। दोनों के लिए जिला स्तर पर अपना रजिस्ट्रेशन करवाने की बाध्यता रखी गई है। जिसकी फीस काफी ज्यादा है जो कि हर चार साल में भरनी होगी। उनका कहना है कि बिल से राज्य की चिकित्सा व्यवस्था पंगु हो जाएगी। बिल से आयुष डॉक्टरों पर काफी बोझ पड़ेगा। जिससे उन्हें मजबूरन इलाज महंगा पड़ेगा। जिसका सीधा असर राज्य की गरीब और अतिदुर्गम इलाकों में रहने वाली जनता पर पड़ेगा। जिन्हें प्राइवेट आयुष डॉक्टर सस्ता और बेहतर इलाज मुहैया करवा रहे हैं। नीमा के प्रदेश उपाध्यक्ष डॉक्टर विनोद खुल्लर ने बताया कि बिल में कई ऐसी खामिया भी हैं जो कि सरकारी चिकित्सालयों में दुर्गम इलाकों में सेवाएं दे रहे आयुष डॉक्टरों का मनोबल तोड़ेगी। इसमें नीमा के किसी भी पदाधिकारी को भी शामिल नहीं किया गया है। जबकि राज्य में 80 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाएं इन्हीं डॉक्टरों के सहारे चल रही है। वहां एलोपैथिक डॉक्टर जाते ही नहीं। उन्होंने मांग की कि जब आयुष डॉक्टरों को अन्य मामलों में एलोपैथिक डॉक्टरों से अलग रखा गया है तो बिल में उन्हें साथ क्यों रखा गया। वार्ता के दौरान डॉ सीएस कांडपाल, डॉ आरसी जोशी, डॉ एसके शर्मा, डॉ अशोक लोहनी और डॉ अतुल राजपाल मौजूद थे।प्रावधान है।

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