
बागेश्वर। जिले में सरकारी शिक्षा व्यवस्था पटरी से उतर चुकी है। यहां की 804 शिक्षण संस्थाओं में शिक्षकों और प्रधानाचार्यों के 2451 पद सृजित हैं। इनमें से 583 पद खाली हैं। खासकर कपकोट के दुर्गम और उच्च हिमालयी क्षेत्र में शिक्षक जाना नहीं चाहते। उत्तराखंड राज्य बनने के इतने लंबे अंतराल बाद भी सरकार बुनियादी शिक्षा के लिए कुछ नहीं कर पाई है।
ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों की हालत दयनीय बनी हुई है। इनमें प्राथमिक विद्यालय सर्वाधिक समस्याग्रस्त हैं। 602 विद्यालयों में शिक्षकों और प्रधानाध्यापकों के कुल 868 पद सृजित किए गए हैं। इनमें भी मात्र 660 शिक्षक तैनात किए गए हैं। इसी प्रकार जूनियर हाईस्कूलों में प्रधानाध्यापकों के 30 में से 10 पद खाली हैं। सहायक अध्यापकाें के 405 पद सृजित हैं और 384 कार्यरत हैं। जिले के 40 इंटर कालेजों में से 37 में ही प्रधानाचार्यों के पद सृजित हैं। जिनमें से मात्र 15 पद भरे गए हैं। शिक्षकों के 346 पदों में से 146 पद खाली पड़े हैं। 44 राजकीय हाईस्कूलों में शिक्षकों के 742 में से 221 पद खाली हैं। सबसे दयनीय हालत कपकोट के दुर्गम इलाकों की है। यहां के अधिकतर विद्यालयों में नियमित शिक्षक नहीं हैं। इस क्षेत्र का पैदल भ्रमण कर रहे विधायक ललित फर्स्वाण और सांसद प्रदीप टम्टा ने बताया कि तीख, भराकांडे, पटास में एक-एक शिक्षा मित्र और मिखिला और खलपट्टा स्थित अनुसूृचित जाति, जनजाति बहुल गांवों के विद्यालयों में आंगनबाड़ी वर्कर पढ़ा रही हैं। देश में शिक्षा का अधिकारी कानून लागू है किंतु इस क्षेत्र में इस अधिनियम का पालन नहीं हो रहा है। यहां आने से पहले ही शिक्षक तबादला करा लेते हैं। जिला मुख्यालय और इसके आसपास सुगम विद्यालयों में छात्र-छात्राओं की संख्या कम है और मानकों के विपरित अधिक शिक्षक कार्यरत हैं।
वितरण व्यवस्था के अभाव में पेयजल संकट
बागेश्वर। जिले में सरयू, गोमती, पिंडर, लाहुर, गरुड़ गंगा, पुंगर सहित कई नदियां और भारी मात्रा में जल स्रोत उपलब्ध हैं। किंतु पेयजल वितरण की व्यवस्था ठीक नहीं है। खासकर जिला मुख्यालय के लिए बनी चार पेयजल योजनाओं से आवश्यकतानुसार पेयजल बांटा जा सकता है। किंतु पेयजल लाइनें सही हालत में नहीं हैं। वितरण व्यवस्था भी ठीक नहीं है। नगर पेयजल योजना के पुनर्गठन का मामला अभी तक लटका हुआ है।
