लोकतंत्र में नक्सल हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है: मनमोहन

लोकतंत्र में नक्सल हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है: मनमोहन

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आज कहा कि नक्सल समस्या से निपटने के लिए केन्द्र और राज्यों को मिलकर काम करने की जरूरत है। सिंह ने यहां आंतरिक सुरक्षा पर मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में छत्तीसगढ में पिछले दिनों कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं पर हुए नक्सल हमले का उल्लेख करते हुए कहा कि इस तरह की हिंसा का हमारे लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है । केन्द्र और राज्यों को साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है ताकि सुनिश्चित हो सके कि इस तरह की घटना फिर से न होने पाए। उन्होंने कहा कि पिछले दो साल में नक्सल हिंसा की घटनाओं और इसमें होने वाली मौतों की संख्या में काफी कमी आई है। नक्सलियों के आत्मसमर्पण के मामलों में भी बढोतरी दर्ज की गयी है लेकिन छत्तीसगढ हमले जैसे नक्सलियों के बडे हिंसक हमले हमारे लिए झटका हैं।

बड़े पैमाने पर होने वाले ऐसे हमलों से निपटने के लिए केन्द्र और राज्यों को मिलकर काम करना चाहिए। प्रधानमंत्री ने कहा कि इस दिशा में केन्द्र सरकार ने कदम उठाने शुरू कर दिये हैं । ‘‘मुझे उम्मीद है कि राज्य सरकारें हमारे साथ पूरा सहयोग करेंगी और हमारे प्रयासों को और प्रभावी बनाएंगी।’’ उन्होंने कहा कि माओवादियों के खिलाफ सक्रियता से सतत अभियान चलाने और वामपंथी उग्रवाद प्रभावित इलाकों में विकास और शासन से जुडे मुद्दों के समाधान की दोस्तरीय रणनीति को और मजबूत करने की जरूरत है।

सिंह ने कहा कि माओवादी हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा और खुफिया तंत्र मजबूत करने के प्रायासों के साथ ही हमें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसे इलाकों में रहने वाले लोग शांति और सुरक्षा के माहौल में रह सकें और विकास के प्रयासों से उन्हें पूरा फायदा हासिल हो सके। सिंह ने कहा कि नक्सल चुनौती से निपटने की रणनीति पर राष्ट्रीय आम सहमति कायम करने के उद्देश्य से सरकार ने दस जून को सर्वदलीय बैठक बुलायी है। जम्मू कश्मीर के हालात की चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि 2012 में राज्य के सुरक्षा हालात में काफी सुधार हुआ है। सीमा पार से घुसपैठ रोकने की हमारी रणनीति और खुफिया जानकारी आधारित आतंकवाद रोधी अभियानों से 2012 में आतंकवादी हिंसा में 2011 के मुकाबले लगभग एक तिहाई कमी आई है। 2012 में पर्यटकों की रिकार्ड आमद राज्य में सुधरे हुए सुरक्षा हालात की ओर इशारा करती है।

पूर्वोत्तर की स्थिति को अभी भी पेचीदा मानते हुए उन्होंने कहा कि उग्रवाद, धन वसूली और विरोध प्रदर्शन पूर्वोत्तर के उग्रवादियों के बाधा पहुंचाने के मुख्य हथियार हैं। कई उग्रवादी एवं जातीय अलगाववादी दलों से हालांकि वार्ता प्रक्रिया में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर के जो भी समूह हिंसा छोडकर संविधान के ढांचे में रहते हुए अपनी समस्याओं का समाधान चाहते हैं, उनके साथ वार्ता को संतोषजनक निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है। आंतरिक सुरक्षा को लेकर सिंह ने दो और मुद्दों पर ध्यान आकर्षित किया। ये सांप्रदायिक हिंसा और महिलाओं एवं बच्चों पर अपराध हैं।

उन्होंने कहा कि 2012 में 2011 के मुकाबले सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में तेजी दर्ज की गई। प्रधानमंत्री ने कहा कि इस बात से सभी सहमत होंगे कि सतत विकास और संपन्नता के लिए हमारे देश में सांप्रदायिक सदभाव बनाये रखना काफी महत्वपूर्ण है । ऐसे मे आवश्यक है कि हर तरह की सांप्रदायिक ताकतों से सख्ती से निपटा जाए । साथ ही हमें अल्पसंख्यकों और समाज के कमजोर वगो’ विशेषकर अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों की विशेष आवश्यकताओं को पहचान कर उन्हें पूरा करने की जरूरत है।

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