
हल्द्वानी। शहर की सड़कों से लेकर गली-मोहल्लों में घूमने वाले आवारा जानवरों और सुअरों की धरपकड़ के लिए नगर निगम ने आंखें फेर ली हैं। नगर निगम प्रशासन के मुताबिक पिछले सात सालों में शहर की सड़कों पर कोई भी आवारा जानवर घूमता नहीं दिखा है। नगर निगम के इस दावे ने शहर के प्रति उसकी संवेदनशीलता एवं लापरवाही की पोल खोल दी है।
शहर की सड़कों, पार्कों और गली मोहल्लों में आवारा जानवरों का आतंक है। बाजार से लेकर मुख्य मार्गों पर आवारा जानवर सड़कों पर लेटें रहते हैं। जानवरों को बचाने के चक्कर में कई बार तो हादसे हो चुके हैं। घोड़े और खच्चरों के बीमार एवं लंगड़ा होने पर उन्हें आवारा छोड़ दिया जाता है। अधिकतर घोड़े और खच्चर भूख-प्यास से मर तक जाते हैं। नगर निगम के कर्मचारी मरे जानवर को उठाने तक नहीं पहुंचते हैं। गली मोहल्ले वाले ही सामूहिक रूप से चंदा कर मरे जानवर को ठिकाने लगाते हैं।
आवारा जानवरों की तरह कई वार्डों में सुअरों का आतंक है। सुअर गंदगी के ढेर को फैलाते हैं, जिससे आसपास के लोगों को वहां से गुजरना मुश्किल होता है। आवारा कुत्तों के लोगों को काटने की हर महीने दर्जनों घटनाएं होती हैं। समाजसेवी गुरविंदर सिंह चड्डा की आरटीआई पर नगर निगम ने इसका खुलासा किया है। नगर निगम के मुताबिक वर्ष 2004-2005 में 79 सुअर और आवारा जानवरों में 13 घोड़े, खच्चर पकड़े गए। इसके बाद नगर निगम को शहर में कहीं भी सुअर, आवारा जानवर और कुत्ते नजर नहीं आए।
निगम के मुताबिक काजी हाउस में रहने वाले जानवरों के चारे पर वर्ष 2011-2012 में कोई खर्च नहीं हुआ है, जबकि इस साल काजी हाउस में 35 जानवर मरे हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है काजी हाउस के जानवर स्वाभाविक नहीं मरे। चारे के अभाव में जानवरों ने दम तोड़ा है। ऐसे में पशु क्रूरता अधिनियम के तहत निगम प्रशासन पर मुकदमा भी दर्ज हो सकता है।
