
बिलासपुर। लगभग 1800 वर्ग फुट का प्लाट और रहने वाले पांच-पांच परिवार। पुश्तैनी जमीन का मालिकाना हक गंवाने के बाद प्लाट तो मिला, लेकिन वह भी लीज पर। परिवार बढ़ते गए और जमीन वही है। समय के साथ जरूरत महसूस हुई तो प्लाट के साथ लगती खाली जमीन पर सजा दिया अपने ‘सपनों का महल’। जी हां, विस्थापन का दंश झेलने वाले बिलासपुर वासियों के कब्जों को नियमित करने बारे सरकार अब तक कोई पालिसी नहीं बना पाई। तकरीबन दो साल पहले इसकी सुगबुगाहट शुरू जरूर हुई, लेकिन धरातल पर अभी तक सब शून्य है।
बिलासपुर शहर के अधिकतर लोगों की यहीं दिक्कत है। मजबूरी और विवशता में लोगों ने सरकारी जमीन पर कब्जे कर लिए। सरकार से कई बार इन कब्जों को नियमित करने की मांगें भी उठती रही। इसके लिए विशेष पालिसी बनाने को भी इलाकावासियों ने आवाज बुलंद की। समाधान के लिए सुझाव भी दिए गए, किंतु आज तक कुछ नहीं हो पाया। विस्थापितों की मानें तो पुराने शहर को छोड़ जब वह यहां आए तो उनकी जमीनें भी भाखड़ा बांध के लिए पानी भरने के बाद जलमग्न हो गई। जितनी जमीन पानी में डूबी उतनी नहीं मिली। ऐसे में नए प्लाट पर आशियाने तो बन गए, लेकिन समय के साथ यह प्लाट छोटा पड़ गया। इनके बुजुर्ग जीवित थे उन्हें महज एक ही प्लाट मिला। ऐसे में परिवार के सदस्य बढ़े तो भाइयों को अपना अलग आशियाना बनाने की जरूरत महसूस हुई। भाखड़ा विस्थापित अधिकार संरक्षण समिति के महासचिव जय कुमार कहते हैं कि पालिसी बनाने के लिए मुख्यमंत्री से लेकर कई विभागों के अधिकारियों से विस्थापितों ने मांग उठाई। वह स्वयं कई बार बैठकों में भाग लेने के लिए गए। आश्वासनों के अलावा कुछ नहीं मिला। अब सत्ता परिवर्तन हुआ है तो विस्थापितों को कुछ उम्मीद है। उनके अनुसार अवैध कब्जे या तो नियमित किए जाएं या फिर उतनी जमीन अलाट की जाए, जितनी पानी में डूबी है। लीज पर मिले प्लाट की तर्ज पर कब्जे वाली भूमि को भी लीज पर ही दिया जा सकता है। ऐसे कई सुझाव सरकार के समक्ष रखे गए हैं। जिन पर विचार करने की जरूरत है। पूर्व कर्मचारी नेता केश पठानिया ने कहा कि यह बिलासपुर के कई परिवारों की हालत है। कब्जे मजबूरी में किए गए हैं, लिहाजा इन्हें नियमित किया जाना चाहिए। कुलदीप का कहना है कि अवैध कब्जे नियमित करने के लिए जल्द से जल्द पालिसी बनाई जानी चाहिए। उधर, उपायुक्त डा. अजय शर्मा कहते हैं कि पालिसी पर बनाई जा रही है।
