‘5 साल बाद दिखाई देगा एक ग्लैमरस दून’

देहरादून नगर निगम के दोबारा मेयर चुने गए विनोद चमोली का दावा है कि आने वाले पांच सालों में एक ग्लैमरस दून नजर आएगा लेकिन ऐसा कैसे होगा इसे शायद वह भी नहीं जानते।

मुख्य वजह तो यही है कि नगर निगम के पास इतना अधिकार ही नहीं है कि वह विकास के कार्य कर सके। जो कुछ कर भी सकता है उसे भी सरकार करने नहीं देती। इसे मेयर भी मानते हैं। नगर निगम के अधिकारों को लेकर मेयर से हुई बातचीत के कुछ मुख्य अंश प्रस्तुत हैं।

दोबारा मेयर चुने जाने के बाद आप बहुत खुश हैं लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि बिना अधिकारों वाले इस पद पर चुने जाने के क्या मायने हैं?
नगर निगम के अधिकार सीमित हैं इसमें कोई दो राय नहीं है लेकिन ऐसा पूरे देश में है। इसे प्रभावी बनाने के लिए समय-समय पर केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार से वार्ता करते रहे हैं लेकिन इसे अधिकार दिलाने में कामयाबी नहीं मिली। अपने संदर्भ में कहूं तो इसी वजह से मेरी पूरी क्षमता निकलकर सामने नहीं आ पा रही है।

ऐसा क्यों है?
दरअसल, हम दुनिया के सबसे बड़े देश के सबसे बड़े लोकतंत्र तो हैं लेकिन अभी लोकतांत्रिक नहीं हो पाए हैं। हमारी सत्ता का विकेंद्रीयकरण नहीं हो पाया है। हमारे यहां लोकल सरकार का कंसेप्ट तो है लेकिन उस पर अमल नहीं किया जाता है।

स्थानीय निकायों को मजबूत और अधिकार संपन्न बनाने के लिए राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे तभी संविधान में 74वां संशोधन किया था लेकिन उसे आज तक लागू नहीं किया गया। कुल मिलाकर मामला नीयत का है। यह सही है कि निगम के पास सीमित अधिकार हैं लेकिन जो हैं उसे भी करने नहीं दिया जाता।

इसके पीछे क्या वजह हो सकती है?
निगम में शासन की तरफ से एक� अधिकारी बैठा दिया जाता है जो शासन के निर्देश पर काम करता है। हमारे कार्यों में हस्तक्षेप करके हमें शर्मसार करता है। क्या कार्य होने चाहिए इसे पालिटिकल ब्यूरोक्रेसी तय करती है और उस पर अमल करवाना ब्यूरोके्रसी का काम होता है लेकिन ऐसा किया नहीं जाता है।

हमारा सिस्टम इतना लचर हो गया है कि पालिटिकल ब्यूरोक्रेसी पर ब्यूरोक्रेसी हावी हो गई है। राजनीतिक दलों को चाहिए कि वह इस स्थिति को सुधारें लेकिन वे अपने हित में इसका इस्तेमाल करते हैं। एमएनए को यह कहकर भेज दिया जाता है कि मेयर को कोई काम नहीं करने देना है। इसकेबाद वह हमारी क्यों सुनेगा?

आपके कहने का मतलब है कि मुख्य नगर अधिकार (एमएनए) के माध्यम से सरकार निगम को अपने हिसाब से चलाती है?
हां, यही होता है।

ऐसे में आप कई बार असहाय नजर आए होंगे?
नहीं मैं असहाय नहीं होता। मेरा बेसिक करेक्टर फाइटिंग का है। मैं संघर्ष के रास्ते से निकला हूं। कितनी भी विपरीत परिस्थितियां हों भागता नहीं, लड़ता हूं। होर्डिंग मामले में मेरी अपनी ही सरकार से ठन गई थी। मुख्यमंत्री से लेकर संगठन तक सभी मेरे खिलाफ हो गए थे। लेकिन मैं भागा नहीं। हाईकोर्ट गया और अदालत के निर्णय के बाद शहर को होर्डिंग से मुक्त करा दिया। आज की तारीख देहरादून देश में ऐसा शहर है जहां छतों पर होर्डिंग नहीं मिलेंगे।

सरकार और संगठन के खिलाफ जाने का आपको खामियाजा भी भुगतना पड़ा होगा?
भुगतना पड़ा न। दोबारा टिकट मिलना मुश्किल हो गया था। कहा गया कि यह तो जिद्दी है। किसी की सुनता नहीं है। लेकिन मुझे टिकट मिला और परिणाम सबकेसामने है।

अपनी सरकार के समय आपने निगम की स्वयत्तता और अधिकार संपन्न बनाने के लिए क्या किया?
मैंने बहुत सारे प्रस्ताव अपनी सरकार के पास भेजे और अब कांग्रेस सरकार के पास भी भेजे हैं लेकिन किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया।

आपको अधिकतर कार्यों के लिए एमएनए पर निर्भर रहना पड़ता होगा?
यह व्यक्ति की अपनी कार्यशैली पर निर्भर करता है। मैंने अपने कार्यकाल में चार-चार एमएनए देखे। इसमें से कुछ अच्छे तो कुछ बुरे थे, लेकिन जो भी रहा उससे कार्य करवाने में सफल रहा।

पिछले कार्यकाल में आपका वास्ता अपनी ही पार्टी की सरकार से अधिक रहा फिर भी आप निगम को अधिकार संपन्न नहीं बनवा पाए?
मैंने कहा न, सरकार किसी भी पार्टी की हो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। एनडी तिवारी जैसे उदार हृदय और बड़ी सोच वाले व्यक्ति के शासनकाल में कांग्रेस पार्टी की मेयर रही मनोरमा शर्मा कोई कार्य नहीं कर पाई थी। उन्हें कार्य करने ही नहीं दिया गया। कुछ मंत्रियों ने उनके साथ अभद्रता तक की थी।

नगर निगम का मेयर कुछ कर सकेयह इस पर भी निर्भर करता है कि शासन का मुखिया कैसा है। यदि मुखिया विकास पसंद है तो वह कार्य करने देगा।

आपके पिछले कार्यकाल के कई प्रस्ताव शासन में लटके हैं उसके लिए आपने क्या किया?
सच तो यह है कि स्थानीय निकाय से ही आगे की राजनीति निकलती है लेकिन किसी भी सरकार की प्रथमिकता में स्थानीय निकाय नहीं होते हैं। यदि प्रदेश के 69 निकायों को मजबूत बना दिया जाए तो सरकार का काम पूरेप्रदेश में दिखाई देगा लेकिन सरकारों को यह बात समझ में नहीं आती। सरकारों की प्राथमिकता में निकाय आएं तो उसे बहुत यश मिलेगा। दरअसल, हमारे निकायों का ढांचा बहुत पुराना हो गया है इसके पुनर्गठन की सख्त जरूरत है जो कोई सरकार नहीं करना चाहती।

सरकारें क्यों नहीं करना चाहतीं?
सरकारों की दृष्टिहीनता और बड़े नेताओं के दृष्टिकोण दोष के कारण निकायों को अधिकार नहीं मिल पा रहे हैं। यदि सभी विकास कार्य निगम के माध्यम से हो तो किसी भी शहर की सूरत बदल जाए।

निगम को अधिकार दिलाने केलिए अब क्या करने वाले हैं?
अब संघर्ष होगा। निगम को अधिकार दिलाने के लिए पूरे पांच साल तक संघर्ष चलता रहेगा। सच तो यह है कि जिन संस्थाओं को बनाया है उन्हें अधिकार भी देना चाहिए। अगर अधिकार नहीं दे रहेहैंतो कहीं न कहीं बेईमानी हो रही है।

लोकसभा और विधानसभा की तरह पूरे तामझाम के साथ निकायों का चुनाव होता है। सभी पार्टियां पूरा जोर लगाती हैं लेकिन इसका लाभ क्या है, जब निकायों के पास करने केलिए ही कुछ नहीं होता?
हमारे जैसों को कुछ काम मिल जाता है। यह भी न हो तो हम क्या करेंगे? राजनीतिक दलों को कुछ नेता मिल जाते हैं। जनता को अपनी शिकायतें सुनाने के लिए जनप्रतिनिधि मिल जाते हैं। काम बेशक न हो लेकिन शिकायतें सुन ली जाएं इसी में जनता को� भी तसल्ली हो जाती है।

इसका मतलब तो यह हुआ कि निकाय चुनाव राजनीति में आने की पाठशाला की तरह है?
बिल्कुल। यह एक प्लेटफार्म है, राजनीति में आने के लिए खास करके राजनीतिक पार्टियों के लिए।

अगले पांच साल में शहर के विकास के लिए क्या एजेंडा है?
पुराने प्रोजेक्टों को पूरा कराना प्राथमिकता में होगा। निगम को अधिकार दिलाने के लिए कार्य किया जाएगा। आने वाले पांच सालों में देहरादून विकास केमामले में स्वर्णिम साबित होने वाला है। दून को ग्लेमरस बनाना है। पांच साल बाद एक ग्लेमरस दून दिखाई देगा।

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