16 बरस बाद भी नहीं मिला सीमांत जिले का दर्जा

बागेश्वर। बागेश्वर जिले की लड़ाई सीमांत जिले के बैनर तले लड़ी गई थी। 16 बरस पहले जिला तो बन गया लेकिन इसे आज तक सीमांत जिले का दर्जा नहीं मिल सका है। सीमांत जिले का दर्जा मिलने से यहां रह रहे लोगों में निराशा है। लोग इस मांग को लेकर फिर से आंदोलन शुरू करने का मन बना रहे हैं।
मालूम हो कि क्षेत्र के लोगों के लंबे संघर्ष के बाद बागेश्वर को 15 सितंबर 1997 को पृथक जिले का दर्जा मिला था। बागेश्वर, कपकोट, गरुड़, कांडा तहसीलों और काफलीगैर उपतहसील, बागेश्वर, कपकोट और गरुड़ ब्लाकों को समेटे पृथक जिले की लड़ाई सीमांत जिला बागेश्वर के बैनर तले लड़ी गई थी। जिले की सीमा उत्तर भाग में चीन से मिली है। लोगों को आशा थी कि सीमांत जिला घोषित होने पर जहां क्षेत्र में विकास की गतिविधियां बढ़ेंगी वहीं सेना और सिविल क्षेत्र की नौकरियों में भी इस क्षेत्र के युवाओं को प्राथमिकता मिलेगी लेकिन अरसे बाद भी लोगों की यह मुराद पूरी नहीं हो सकी है जबकि पड़ोसी जिलों में पिथौरागढ़ और चमोली को सीमांत जिले का दर्जा मिला है। जिले के अंतिम गांव बोरबलड़ा, झूनी और कीमू जैसे गांव अभी भी मोटर मार्ग से नहीं जुड़ सके हैं। लोगों को आशा थी कि सीमांत जिले का दर्जा मिलते ही सुदूरवर्ती उच्च हिमालयी क्षेत्र से लगे गांवों की कायाकल्प होगी लेकिन सरकारी उपेक्षा के चलते लोगों की यह मांग आज तक सपना है। जिला निर्माण समति के अध्यक्ष गुसाईं सिंह दफौटी ने कहा कि जिले की लड़ाई ही सीमांत जिला बागेश्वर के बैनर तले लड़ी गई थी। जब तक इसे सीमांत जिले का दर्जा मिल नहीं जाता है तब तक यह लड़ाई अधूरी रहेगी। इसके लिए सरकार पर लगातार दबाव बनाने की जरूरत है। ग्राम प्रधान संगठन के जिलाध्यक्ष प्रवीण सिंह कोरंगा ने कहा कि संघर्ष समिति इस न्यायोचित मांग के लिए जब भी लड़ाई शुरू करेगी संगठन पूरा सहयोग देगा।

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