
सुबह सूरज निकलने से पहले ही उनकी आंख खुल जाती है। घर का दरवाजा खोलकर बाहर दूर तक इस उम्मीद में देखते हैं कि शायद बेटा आ गया हो। कुछ ही पल में निगाहें निराश होकर थक जाती हैं तो घर के अंदर आ जाते हैं।
इसके बाद तैयारी करते हैं हर उस जगह जाने की जहां से उन्हें उनके लाडले को खोजने की मदद मिलने की उम्मीद होती है। पूरे दिन ऐसी जगहों पर भटकने के बाद जब शाम को पहुंचते हैं तो इस तरह थक चुके होते हैं कि शरीर में सांस चलती है लेकिन चेतना गायब सी हो जाती है।
इसके बाद पूरी रात बदहवासी में गुजरती है। नींद में यह खटका बना रहता है कि दरवाजे पर बेटा दस्तक दे रहा है।
उनका बच्चा उनसे दूर चला गया
कई बार वह उठते हैं, दरवाजा खोलते हैं लेकिन फिर निराश होकर बिस्तर पर लेट जाते हैं। इसके बाद आंखों से नींद गायब हो जाती है और चेहरे पर कभी न गायब होने वाली उदासी तारी हो जाती है। मार्च माह में जब से बेटा गायब हुआ है तब से मोहनलाल का यही हाल है।
इसी तरह उनकी पत्नी भी गुमसुम हो गई हैं। यह एक मोहनलाल का ही नहीं बल्कि हर उस माता-पिता का हाल है जिसका बच्चा उनसे दूर चला गया है।
प्रदेश में एक जनवरी 2013 से अब तक 15 वर्ष सेे कम उम्र के 70 मासूम गायब हो चुके हैं। इनमें से कुछ ही मामलों में पुलिस पड़ताल कर रही है, वह भी केवल नाम के लिए। बच्चों का मामला होने के बावजूद पुलिस न तो संवेदना दिखाती है न ही सुरक्षा व्यवस्था को कड़ी करती है।
हद तो तब हो जाती है जब परिजन अपने बच्चे की गुमशुदगी दर्ज कराने थाने जाते हैं तो उन्हें चक्कर कटाया जाता है। थक हार कर वह पुलिस के आला अधिकारियों तक पहुंचते हैं तो मामला दर्ज कर लिया जाता है लेकिन आगे कार्रवाई कितनी होती है इसका अंदाजा लापता बच्चों की बढ़ती संख्या को देखकर लगाया जा सकता है।
हरिद्वार और यूएस नगर टॉप पर
जनवरी से अब तक गुमशुदा बच्चों का औसत निकाला जाए तो इसमें 33 फीसदी अकेले हरिद्वार जिले से गायब हुए हैं। 21 फीसदी गुमशुदगी के साथ ऊधमसिंह नगर दूसरे नंबर पर है। साफ है की प्रदेश के मैदानी इलाकों में बच्चों पर ज्यादा संकट है।
जनवरी से गायब बच्चे
हरिद्वार
23
उधमसिंह नगर
15
नैनीताल
10
देहरादून
5
उत्तरकाशी
4
चमोली
4
टिहरी
4
पौड़ी
3
चंपावत
2
