
हरिद्वार गुरू पूर्णिमा और श्रावण के पहले दिन कांवड़ियों ने आभास करा दिया है कि उत्तराखंड की आपदा कांवड़ियों के कदम नहीं रोक पाएगी। चूंकि कांवड़ यात्रा मन्नतों से जुड़ी हुई है, अत: कांवड़ियों का आना और गंगा जल भरकर लौटना लाजमी है।
कांवड़ यात्रा प्राचीन काल से किसी न किसी रूप में चलती आ रही है। करीब 25 वर्ष पूर्व जब राम जन्म भूमि आंदोलन ने जोर पकड़ा तब कांवड़ यात्रा भी जोर पकड़ गई। पितृ भक्त श्रवण कुमार ने जिस प्रकार माता-पिता को बहंगी में बैठाकर तीर्थाटन कराया था, उसी प्रकार कांवड़िए गंगा जल को बहंगी में ले जाकर यात्रा कराते हैं। कांवड़िए हरकी पैड़ी से जल भरकर मन्नतें मांगते हैं और मन्नत पूरी होने पर फिर कांवड़ चढ़ाने आते हैं। बहुत से कांवड़िए पास होने, मुकदमा जीतने, घर बन जाने, विवाह आदि की कामना को लेकर कांवड़ चढ़ाने आते हैं। कुछ कांवड़िए मन्नत पूरी होने पर आते हैं तो कुछ कांवड़ भरकर ही मन्नत मांगते हैं।
कांवड़ यात्रा अब दिनोंदिन परवान चढ़ती जाएगी। जैसे-जैसे दिन आगे बढ़ेंगे, कांवड़ियों की भीड़ भी बढे़गी। आपदा से पूरा देश द्रवित हुआ। हरिद्वार वासियों की पूरी निगाहें कांवड़ यात्रा पर लगी हुई है। ऐसा लगता है कि आपदा से व्यथित होने के बावजूद कांवड़िए गंगा जल ले जाने के लिए बड़ी संख्या में हरिद्वार आएंगे। शिव और गंगा के प्रति कांवड़ियों का प्रेम थमने वाला नहीं है।
