सोने की बुलाक को भूल गई नई पीढ़ी

चौखुटिया। पर्वतीय क्षेत्रों में पहने जाने वाली सोने की बुलाक के दर्शन अब मुश्किल से ही हो पाते हैं। नई पीढ़ी तो इसका नाम तक भी नहीं जानती, लेकिन रिवाड़ी की रमोती आमा ने इसे सहेज कर रखा है।
रमोती देवी (88) पत्नी बख्तावर सिंह ने बताया कि उनकी शादी 65 साल पहले 1948 में हुई थी। एक तोले का बुलाक तब 70 रुपये में बना था। बताया कि इसे नाक के निचले हिस्से में पहना जाता था। आमा ने सिर्फ बुलाक ही नहीं बल्कि कई पुराने आभूषण और काले रंग का खादी का पाखुला पहनकर भी दिखाया।
द्वाराहाट के वरिष्ठ स्वर्णकार ईश्वरी लाल वर्मा ने बताया कि बुलाक का प्रचलन नेपाल में अब भी खूब है, लेकिन अब यहां पहाड़ में बंद हो गया है। बुलाक आयताकार होती है। सोने के तारों पर नक्कशी करने के बाद नग डाले जाते हैं। बुलाक चांदी की भी बनती थी।

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