सैलरी के बढ़ते बोझ ने तंग किए विकास के रास्ते

शिमला। हिमाचल में सरकारी कर्मचारियों के वेतन-पेंशन का बढ़ता बोझ विकास के रास्ते संकरे करता जा रहा है। शुक्रवार को सदन में पेश वित्त वर्ष 2014-15 के बजट अनुमान बताते हैं कि हिमाचल 100 रुपये में से महज 34 रुपये विकास कार्यों पर खर्च कर रहा है। पिछले साल यह राशि 36 रुपये थी। राज्य सरकार वेतन और पेंशन पर 47 रुपये और ऋणों को चुकाने पर 18 रुपये लगा रही है।
एक पहलू ये भी है कि बजट के कुल आकार में बढ़ोतरी केवल 1846 करोड़ हुई, जबकि वित्तीय घाटे में 3030 करोड़ की वृद्धि हो गई। यह इस साल 2324 करोड़ से बढ़कर 5354 करोड़ रुपये हो गया। इससे विकास कार्याें का कैपिटल एक्सपेंडिचर कम हो रहा है। इसे चुनावी चाल का असर भी माना जा रहा है। राज्य के सरकारी खजाने ने लगातार तीसरे चुनावी बजट को झेला है। 2012 में पूर्व मुख्यमंत्री धूमल ने चुनाव पूर्व लोक लुभावन बजट दिया था। इसके बाद 2013 में मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने कांग्रेस चुनाव घोषणा पत्र के वादे पूरे किए।
अब चूंकि लोकसभा चुनाव सिर पर हैं, इसलिए फिर सबको राहत देने की कोशिश हुई है। लेकिन बिजली के रेट गिरने से निवेश में कमी और इस साल केंद्र से करों की ट्रांसफर पर स्थिति साफ न होने के कारण आगे रास्ता और मुश्किल है। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने बजट भाषण में माना कि हमारे सामने निवेश बढ़ाने की चुनौती है। ये भी बोल गए कि वित्तीय बंदिशें हैं, यदि और संसाधन होते तो कुछ और भी करते।
इनसेट
मंत्रियों में बाजी मार गए मुकेश अग्निहोत्री
इन सब वित्तीय दुश्वारियों के बावजूद कैबिनेट मंत्रियों में उद्योग मंत्री मुकेश अग्निहोत्री बजट में बाजी मार गए। केंद्र सरकार से उद्योगों की फ्रेट और कैपिटल इन्वेस्टिमेंट सब्सिडी बहाल होने के बाद उन्होंने राज्य सरकार से इलेक्ट्रिसिटी डयूटी और स्टांप डयूटी कम करवा ली। लैंड ट्रांसफर शुल्क भी 50 फीसदी हो गया। उद्योगाें के लिए परामर्श परिषद बनेगी और एक सेल अलग से होगा। ये सारे फैसले औद्योगिक निवेश को नई दिशा देंगे।

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