सारकोट के कोठे के छह कमरे ध्वस्त

कर्णप्रयाग। जनपद में गैरसैंण विकासखंड के सारकोट गांव में लगभग छह सौ साल पुराने कोठा (कोर्ट) के छह कमरे ध्वस्त हो गए हैं। ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से इसकी मरम्मत एवं संरक्षण की मांग की है।
सारकोट गांव में लगभग छह सौ साल पुराना कोठा जर्जर हाल में है। 84 लकड़ी के दरवाजे और खिड़की वाले इस चौकोर भवन वाले कोठे का प्रवेश द्वार जहां बीते वर्ष ही पूरी तरह से ध्वस्त हो गया था, वहीं इस बार इसके छह कमरे टूट गए हैं। कोठे के निरंतर टूटने के कारण समीपवर्ती आवासीय मकानों को भी खतरा पैदा हो गया है। गांव के जमन सिंह, अमर सिंह, दीवान सिंह आदि बताते हैं कि कोठे की स्थापना के बाद ही सारकोट गांव की बसागत हुई है। सारे पंवार वंशजों और कोठे से गांव का नाम सारकोट पड़ा। कुछ बुजुर्गों का कहना है कि उन्होंने यहां चालीस के दशक में पटवारी श्याम सिंह को बैठक लेते हुए देखा था।

कोठे का निर्माण काल
सारकोट कोठे का निर्माण मध्यकाल (15वीं-16वीं सदी) गढ़-कुमाऊं में थोकदारी प्रथा के समय में हुआ। इतिहासकारों की मानें तो राजशाही के दौर में सुरक्षा की दृष्टि से इस तरह के विशेष भवनों का निर्माण होता था। इन भवनों में उस समय के थोकदार/सयाने परिवार सहित रहते थे। इन लोगों पर न्यायिक व्यवस्था का जिम्मा भी होता था। वे इन्हीं भवनों से न्यायिक व्यवस्था को संचालित करते थे। इन भवनों में बैठक कक्ष, तहखाना, जेल, पटवारी कक्ष, न्याय अधिकारी कक्ष, घुडसाल आदि होते थे, जो कि सारकोट कोठे में भी मौजूद हैं।

गढ़वाल-कुमाऊं में कोठों का निर्माण बहुत कम हैं। कोठे अपने आप में ऐतिहासिक धरोहरें हैं। इन धरोहरों पर शोध करने के लिए इनके संरक्षण और मरम्मत को शासन-प्रशासन, पुरातत्व एवं पर्यटन विभाग को हरसंभव प्रयास करने चाहिए।
– यशवंत सिंह कटौच, इतिहासकार पौड़ी

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