सरकारी व्यवस्था का एक और अजूबा

अल्मोड़ा। सरकारी व्यवस्था में अफसर कुछ भी अजूबा कर सकते हैं। जैंती आईटीआई भवन के वर्कशॉप वाले हिस्से का काम 20 साल से अधूरा है। तब करीब पांच लाख रुपये और मिल जाते तो वर्कशॉप बनकर तैयार हो जाता। पांच लाख मंजूर नहीं हुए और भवन आज तक अधूरा है। लोक निर्माण विभाग के अफसर 20 सालों से इस अधूरे ढांचे की रखवाली पूरी मुस्तैदी से करवा रहे हैं। यहां करीब दो दशक से लगातार तीन चौकीदार तैनात हैं। अनुमान है कि आज तक इनके वेतन में ही करीब एक करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। इतनी धनराशि में ऐसे करीब चार भवन बनकर तैयार हो जाते।
नब्बे के दशक में 90 लाख रुपये की लागत से बनाए गए आईटीआई के भवन में वर्कशॉप का काम पूरा नहीं हुआ। उस दौर में करीब 15 से 20 लाख रुपये खर्च होने के बाद इसके लिए कुछ धनराशि कम पड़ गई। बताया जाता है कि तब पांच लाख रुपये और मिल जाते तो वर्कशॉप भवन का काम पूरा हो जाता। हालांकि आज इसमें करीब 20-25 लाख का खर्चा आएगा। 20 साल से आज तक धनराशि नहीं मिली और काम भी पूरा नहीं हुआ। इस कारण इसका हस्तांतरण नहीं हुआ है और यह अधूरा ढांचा लोनिवि के कब्जे में ही है।
दिलचस्प बात यह है कि किसी महत्वपूर्ण इमारत की देखरेख भले ही लोनिवि न कर सके लेकिन इस अधूरे ढांचे की देखरेख के लिए लोनिवि ने तीन चौकीदार नियुक्त किए हैं जो आठ-आठ घंटे की ड्यूटी बजाते हैं। अनुमान है कि पिछले 20 साल में इन चौकीदारों के वेतन में ही लगभग एक करोड़ रुपये खर्च हो चुके होंगे। लोनिवि चौकीदारों के वेतन में हर साल करीब सात लाख रुपये खर्च कर रहा है लेकिन अधूरे पड़े भवन के लिए धनराशि मंजूर नहीं की जा रही है। यह माना जा रहा है कि चौकीदारों के वेतन में खर्च हुई इतनी धनराशि में ऐसे करीब चार वर्कशाप बनकर तैयार हो जाते। इस बारे में लोनिवि के अधिकारी कुछ कहने को तैयार नहीं हैं। लोनिवि के अधिशासी अभियंता सुनील कुमार ने इतना जरूर कहा कि अधूरे भवन की देखरेख के लिए चौकीदार नियुक्त किए गए हैं।

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