सरकारी नीतियों से हाकी का भविष्य गोल

चंपावत। हाल ही में भारत की महिला जूनियर हॉकी टीम ने जर्मनी में एफआईएच विश्व कप में कांस्य पदक जीता है। उसका भी सपना है कि उसे भी कभी हॉकी की राष्ट्रीय टीम में जगह मिले पर केंद्र और राज्य सरकार की लचर खेल नीति उस जैसे कई होनहार खिलाड़ियों के सपने को हकीकत में बदलने से रोक रही है। यहां जिक्र हो रहा है हॉकी में नेशनल स्तर पर प्रतिभाग कर चुकी रोशनी नेगी का। वे इन दिनों जिला मुख्यालय में प्रतिभावान बच्चों को हॉकी की कोचिंग दे रही हैं।
हॉकी शायद अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। प्रदेश में हॉकी के खेल को आगे बढ़ाने को प्रशिक्षण तक की सुविधा नहीं है। ये कहना है तीन बार नेशनल स्तर पर खेल चुकी रोशनी नेगी का। रोशनी का हॉकी की स्टिक पकड़ने का सफर वर्ष 2008 से शुरू हुआ। कोच सतीश जोशी ने उनको इस खेल की बारीकियों से रूबरू कराया। कड़ी मेहनत के दम पर साल 2009 में उनका चयन भोपाल में हुई नेशनल टीम में हो गया। इसके बाद 2011 और 2012 उन्होंने लखनऊ और सोनीपत में खेली गई राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में प्रतिभाग किया।
राइट फुलबैक की पोजीशन से खेलने वाली रोशनी इससे पहले चार बार नार्थ जोन की यूनिवर्सिटी टीम से भी खेल चुकी हैं। जिसमें वह रोहतक में दो बार, अमृतसर और बरेली में हुई प्रतियोगिताओं में दो बार कप्तान की हैसियत से शिरकत कर चुकी हैं। एमए में पढ़ने वाली रोशनी हॉकी के प्रति सरकार के गैर जिम्मेदाराना रवैये से बेहद दुखी हैं। उनका कहना है कि हॉकी के लिए कभी भी कैंप का आयोजन नहीं किया जाता है। रोशनी कहती हैं कि सूबे में हॉकी खेलने की इच्छुक लड़कियों के लिए हास्टल भी नहीं बनाए गए हैं। रोशनी ने इस वर्ष नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (एनआईएस) की परीक्षा दी है।

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