
बागेश्वर। आजादी के साढ़े छह दशक बाद पहली बार सांसद प्रदीप टम्टा जिले के अंतिम गांव समडर पहुंचे। सांसद और विधायक इस क्षेत्र की मूलभूत समस्याओं से रू-ब-रू हुए। इस क्षेत्र में कहीं भी अस्पताल नहीं हैं। प्राथमिक स्कूलाें में शिक्षक आना नहीं चाहते। शंभू नदी पर पुल नहीं होने से बरसात के मौसम में यहां के लोग शेष दुनिया से कट जाते हैं। अलग राज्य बनने से भी यहां के डेढ़ हजार लोगों को कोई लाभ नहीं मिला है।
सांसद प्रदीप टम्टा और क्षेत्र के विधायक ललित फर्स्वाण 29 मई को कर्मी इंटर कालेज के समारोह में भाग लेने के बाद हिमालयी गांवाें के पैदल भ्रमण पर निकले। कार्यकर्ताओं और ग्रामीणोें के साथ वह पैदल डौला, बदियाकोट, किलपारा, तीख, कुंवारी, बोराचक झारकोट होते हुए शनिवार को कुल 80 किमी की पैदल यात्रा करके अंतिम गांव समडर पहुंचे। प्रदीप टम्टा इस गांव में पहुंचने वाले पहले लोकसभा सदस्य हैं। ग्रामीणों ने तिलक, चंदन, दही और फूल मालाओं से उन्हें लाद दिया। जनप्रतिनिधियों को अपने बीच पाकर लोग भावुक हो उठे। इसी के साथ सांसद और विधायक यहां के ग्रामीणों की बुनियादी समस्याआें से रूबरू होते रहे। क्षेत्र में कहीं भी अस्पताल नहीं है। एएनएम सेंटर बदियाकोट में है और सबसे निकटवर्ती स्वास्थ्य केंद्र 90 किमी दूर कपकोट में है। यहां तक आने में तीन दिन लग जाते हैं। जल विद्युत परियोजनाओं से लोगों को बिजली नहीं मिल रही है। डौला गांव के प्राथमिक विद्यालय में मात्र एक शिक्षा मित्र है। भराकांडे के लिए 2011 में एक शिक्षक को आउट आफ टर्म प्रमोशन देकर प्रधानाध्यापक के पद पर भेजने के निर्देश हुए। हालात का फायदा उठाकर शिक्षक ने पदोन्नति ले ली लेकिन लगातार यहां आने से आज तक बचता रहा। यहां भी मात्र एक शिक्षक है। जीआईसी कर्मी के लिए नियुक्त दो शिक्षक डायट बागेश्वर में और एक बोर्ड मुख्यालय रामनगर में संबद्ध है। ग्रामीणों ने उन्हें बताया कि शंभू नदी में पुल नहीं होने के कारण बरसात और इसके आसपास कम से कम पांच महीने तक उनका दुनिया से संपर्क कट जाता है। उनके सांस्कृतिक, सामाजिक रिश्ते देवाल और ग्वालदम क्षेत्र में हैं। किंतु यहां के लिए सड़क नहीं है। जनवरी से अभी तक राशन नहीं मिला है। सांसद और विधायक ने कहा कि वह इन समस्याओं को सरकार के स्तर पर उठाएंगे। निराकरण के लिए गंभीरता से प्रयास किए जाएंगे।
