
भरमौर (चंबा)। मणिमहेश यात्रा का आखिरी पड़ाव डल झील है। गौरीकुंड से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर डल झील पर पहुंचकर श्रद्धालु यहां की परिक्रमा करके स्नान करते हैं। फिर प्राचीन चतुर्मुखी शिवलिंग की पूजा करते हैं। समुद्र तल से करीब 13 हजार 500 फीट की ऊंचाई पर स्थित डल झील के सामने पवित्र मणिमहेश कैलाश पर्वत दिखता है। इसके दर्शन कर शिव भक्त अपनी इस यात्रा को सफल मानते हैं। हालांकि यह पर्वत अक्सर बादलों में ही छिपा रहता है। अचानक ही यहां से बादल छंटने और इस पवित्र पर्वत के दर्शन होना किसी चमत्कार से कम नहीं माना जाता। इतना ही नहीं शिव भक्तों की सच्ची श्रद्धा की परीक्षा डल झील पर विश्राम के दौरान रात को कैलाश पर मणि की चमक के साथ पूरी होती है। कहा जाता है कि जिसमें सच्ची श्रद्धा हो और भोले बाबा की कृपा हो, उसे ही मणि के रूप में अलौकिक दिव्य ज्योति के दर्शन होते हैं। तेरह किलोमीटर की घुमावदार चढ़ाई को चढ़कर जैसे ही श्रद्धालु डल झील पर पहुंचकर डुबकी लगाते हैं तो उसके बाद श्रद्धालुओं की 13 किलोमीटर की चढ़ाई की थकान मिट जाती है। कई श्रद्धालु यहां पवित्र डल झील पर रात को अलौकिक दिव्य ज्योति के दर्शन के लिए रुक जाते हैं तो कुछ स्नान कर डलझील का जल लेकर वापस लौट जाते हैं। अधिकतर श्रद्धालु यहां मां गंगा के जल को लेकर आते हैं और जल को चतुर्मुखी शिवलिंग पर डालने के बाद डल झील के कुंड से जल भरकर ले जाते हैं। यह जल पूजा के लिए प्रयोग किया जाता है। अधिकतर श्रद्धालुआें को पवित्र कैलाश के दर्शन तक नहीं हो पाते हैं। ज्यादा समय तक कैलाश पर्वत पर धुंध छाई रहती है। डलझील के पुजारी विजय कुमार, महिंद्र कुमार, पवन कुमार और राकेश कुमार ने बताया कि कैलाश पर्वत के दर्शन वही लोग कर पाते हैं जो सच्ची श्रद्धा से यात्रा करने आते हैं।
