
सोलन। संस्कृत भाषा की तरफ सोलन के युवाओं का रुझान कम होता जा रहा है। विद्यार्थियों के तकनीकी क्षेत्र में बढ़ते कदम प्राचीन भाषा को पीछे धकेल रहे हैं। शास्त्री करने वाले युवाओं का आंकड़ा प्रतिवर्ष गिर रहा है। ऐसे में संस्कृत भाषा के संवर्द्धन की तमाम कोशिशें नाकाम साबित होती दिख रही हैं।
सोलन का संस्कृत कालेज इसका उदाहरण है। इस बार कालेज में प्रथम वर्ष में रूसा अधिनियम के तहत महज 45 एडमिशन ही हो सकी हैं। जिसमें प्राग-1 (11वीं) में 27 और पराग-2 (12वीं ) 27 ही विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया है। वहीं शास्त्री प्रथम 41, शास्त्री टू में 32 और शास्त्री थ्री में 30 विद्यार्थी ने प्रवेश लिया है। कालेज में कुल 157 विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया। यह आंक ड़ा पिछले वर्ष के मुकाबले सीधा 25 प्रतिशत तक गिरा है। 2012 में कुल 211 विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया था।
शास्त्री में प्रवेश ले रहे मोहिंद शर्मा के अनुसार उनके दोस्त रोहित प्रभाकर ने बी-टेक में प्रवेश लिया है। उसका मानना है कि इस क्षेत्र में रोजगार के अधिक अवसर है। बी-टेक कर वह किसी अच्छी कंपनी में लग जाएगा। वहंीं मनोज शर्मा ने बताया कि इच्छा संस्कृत पढ़ने में है। संस्कृत हमारे पुराणों जुड़ा है। अन्य सभी मित्र दसवीं पास कर अन्य संकाय में प्रवेश ले रहे हैं। कालेज प्रधानाचार्य राम दत्त शर्मा ने बताया कि संस्कृत पढ़ने और शास्त्री में स्नातक करने में विद्यार्थियों का रुझान कम देखने को मिल रहा है।
बदलाव की जरूरत : प्रेम लाल गौतम
इस संबंध में संस्कृत कालेज के पूर्व प्राचार्य और साहित्यकार डा प्रेम लाल गौतम के अनुसार आधुनिक दौर में शास्त्री से संबंधित पाठ्यक्रमों में बदलाव की अत्यंत आवश्यकता है। पाठ्यक्रम वर्तमान परिदृश्य में रोजगारन्मुख होना जरूरी है। वहीं किसी भी नौकरी में 50 फीसदी अंकों का होना अनिवार्य होना आवश्यक कर दिया है। शास्त्री में स्थान काफी सीमित होने के कारण व्यवसाय परख नहीं है। शिक्षक शास्त्री यानी बीएड की व्यवस्था नहीं है। लिहाजा व्यवस्था में बदलाव से ही इस प्राचीन शिक्षा पद्धति को संजोकर रखा जा सकता है।
