शैलेश का साहित्य संघर्ष की एक दास्तां

हल्द्वानी। शैलेश मटियानी का साहित्य संघर्ष की एक दास्तां हैं। मटियानी उन चुनिंदा साहित्यकारों में हैं जिन्हें हम सीमाओं में बांधकर नहीं रख सकते। क्योंकि उनके रचे साहित्य में ‘बोरीवली से बोरीबंदर’ तक है तो ‘बर्फ की चट्टानें’ भी हैं। उनकी रचनाओं में हमेशा आम आदमी की बात हुई चाहे फिर वह मुंबई की गलियों का हो या फिर सुदूर पहाड़ के किसी गांव का। पहाड़ की महिलाओं की पीड़ा को शैलेश ने असल मायनों में समझा। यह तमाम बातें सोमवार को मटियानी जी के 82वें जन्मदिन पर आयोजित गोष्ठी में हुईं।
नवाबी रोड के पास अरुणोदय संस्था की ओर से आयोजित गोष्ठी का शुभारंभ डा. उर्वीश मिश्र, जनार्दन दुर्गापाल, प्रोफेसर राम सिंह और जगदीश बेलवाल ने संयुक्त रूप से किया। वक्ताओं ने कहा कि शैलेश मटियानी ने तमाम समस्याएं झेली, लेकिन समझौता नहीं किया। कुमाऊं के बाड़ेछीना (अल्मोड़ा) में 14 अक्तूबर 1931 को जन्मे मटियानी ने बोरीवली से बोरीबंदर तक, हौलदार, जयमाला, जल तरंग, चिट्ठी रसैन, कबूतरखाना, माया सरोवर, रामकली, मुठभेड़, नागवल्ली, बर्फ गिर चुकने के बाद, सावित्री, भागे हुए लोग, छोटे-छोटे पक्षी, डेरेवाली जैसे प्रमुख उपन्यासों के साथ ही हारा हुआ, तीसरा सुख, हत्यारे, चील, महाभोज, कोहरा, प्यास और पत्थर, सूखा सागर, नाच जमूरे नाच, भेड़ें और गडरिया, बर्फ की चट्टानें, जंगल में मंगल, दो दुखों का एक सुख, उत्सव के बाद आदि प्रमुख कहानी संग्रह लिखे। जनपक्ष और विकल्प पत्रिका का संपादन किया। वह संस्थागत सम्मान, शारदा सम्मान, लोहिया पुरस्कार, साधना सम्मान से नवाजे गए। मटियानी पर अब तक करीब आधा दर्जन शोध हो चुके हैं। गोेष्ठी में नंदा बल्लभ, शंकर दत्त कांडपाल, कृष्ण पांडे, जीवन सिंह रावत, मुक्ता बहन, रमेश चंद्र पंत, पुष्पलता जोशी आदि लोग मौजूद रहे।

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