शूगर मरीजों को इंजेक्शन से छुटकारे की तैयारी

शिमला। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय का रसायन विभाग पोलीमर कैप्सूल पर शोध कर रहा है। यह शोध यदि सफल रहा तो शूगर के मरीजों को इन्सुलिन के इंजेक्शन से छुटकारा मिल जाएगा। वर्तमान में मधुमेह के मरीजों को इंजेक्शन के माध्यम से ही दवा दी जाती है। वीरवार को पोलीमर विषय पर रसायन विभाग की ओर से आयोजित सेमीनार में दवाओं और कृत्रिम अंगों में हो रहे इसके इस्तेमाल पर चरचा हुई।
सेमीनार के बाद रसायन विभाग के प्रो. घनश्याम चौहान ने बताया कि विभाग में पोलीमर पर शोध चल रहा है। पोलीमर का इस्तेमाल कर शूगर मरीजों के लिए कैप्सूल बनाने के प्रोजेक्ट पर भी काम हो रहा है। इसमें सफलता मिलने के बाद शूगर के मरीजों को दिन में इन्सुलिन लेने की जरूरत नहीं रहेगी। वर्तमान मेें पोलीमर के अभाव में शूगर की दवा को सीधे नहीं खाया जा सकता है। इसे पेट की गैस के कारण खाने से फायदा नहीं मिलता है। इसलिए शूगर के मरीजों को इन्सुलिन के माध्यम से दवा लेनी होती है।
पोलीमर कैप्सूल के बनने के बाद मरीज इसका इस्तेमाल कर सकेंगे। इस कैप्सूल में पोलीमर के साथ ग्लूकोज डाला जाएगा। पेट में पहुंचने के बाद इस पर गैसों का कोई असर नहीं होगा। कैप्सूल के आंत में पहुंचने के बाद पोलीमर का आकार बढ़ेगा। इसके साथ ही ग्लूकोज मरीज के खून में मिल सकेगा। वर्तमान में पेट में ही दवा ब्रस्ट होने का खतरा बना रहता है। ऐसे में गैस से दवा बेअसर हो जाती है। इस तकनीक का इस्तेमाल हृदयरोग की सूरत में स्टेंट डालती बार या कृत्रिम किडनी में भी हो सकता है।
इनसेट
अभी वक्त लगेगा प्रोजेक्ट में : प्रो. चौहान
प्रोजेक्ट को-आर्डिनेटर प्रो. घनश्याम चौहान ने कहा कि यह शोध यूजीसी के सेप (स्पेशल एसिस्टेंस प्रोग्राम) प्रोजेक्ट के तहत चल रहा है। प्रारंभिक चरण में शोध को वर्केबल पाया गया है। हालांकि इसके पूरा होने में अभी वक्त लगेगा। देश में एक या दो अन्य विश्वविद्यालय भी इस पर काम कर रहे हैं। इसमें बहुत संभावनाएं हैं। कुछ मामलों में ऐसा पोलीमर चाहिए होता है, जो जल्द खत्म न हो। लेकिन कहीं जल्द खत्म होने वाले पोलीमर की जरूरत रहती है। उदाहरण के तौर पर हिप रिप्लेसमेंट के लिए खत्म न होने वाले पोलीमर का इस्तेमाल किया जाता है।

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