शिक्षण संस्थान तो खोले, गुणवत्ता भूले

करीब 15 हजार स्कूलों और 70 हजार शिक्षकों वाले शिक्षा विभाग को आज के दौर में नई नजर से देखने की जरूरत है। हिमाचल में सरकारी स्कूलों में गिरता शिक्षा की गुणवत्ता का स्तर चिंताजनक है और इसके लिए राज्य सरकारें भी जिम्मेदार हैं। चुनावी दौर में हमें इस ओर ध्यान देकर कमियों को दूर करना होगा।
केंद्र सरकार के पैटर्न के अनुसार अध्यापक-छात्र रेशो 1-40 है। यानी 40 छात्रों की क्लास पर एक शिक्षक। लेकिन हिमाचल में आज भी एलीमेंटरी में ये 1-60 और सेकेंडरी में 1-70 है। आज हालत ये है कि क्लास में बच्चे चाहे 4 हों या 100, टीचर एक ही होगा। जबकि होना तो ये चाहिए था कि स्कूल बेशक कम हों, लेकिन प्राइमरी की पांच कक्षाओं के लिए कम से कम 5 टीचर होते। इन्हीं पांच वर्र्षों में बच्चों की पढ़ाई का नींव बनती है। लेकिन इसी दौरान गुणवत्ता के लिहाज से हालत सबसे ज्यादा खराब है।
आज सरकारों में कंपीटीशन ये है कि कौन घर के कितना नजदीक स्कूल खोलेगा। कभी डेढ़ किलोमीटर दूरी का फार्मूला बनता है तो कभी लोगों की मांग को पूरा करने के दावे राजनेता करते हैं, लेकिन इस नीति से शिक्षा की हालत और खराब होती जा रही है। आज नए अपग्रेडिड कई स्कूलों को एडमिशन के लिए बच्चे नहीं मिल रहे। करीब 160 स्कूलों में छात्र संख्या 5 से भी कम है। सरकारी स्कूलों में फ्री वर्दी, किताबें, मुफ्त बस यात्रा, दोपहर का खाना और स्कॉलरशिप देने के बावजूद हालत बिगड़ती जा रही है। एनरोलमेंट पिछले 10 साल से गिर रहा है, जबकि प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने का चलन बढ़ रहा है। ऐसा क्यों है? ये सोचने का समय किसी सरकार के पास नहीं है।
पहले केंद्रीय स्कीमों के तहत डीपीपी और एसएसए शुरू हुआ। फिर आरएमएसए, मिड डे मील, रूसा जैसे केंद्रीय प्रोजेक्ट आए। आरटीई ने तो हालत और खराब कर दी। सतत समग्र मूल्यांकन के नाम पर 8वीं तक किसी को भी फेल करना बंद कर दिया। क्लास में बच्चे को शिक्षक डांट तक नहीं सकते। ये सारे प्रयोग केवल सरकारी स्कूलों में हुए और इनकी ही हालत आज सबसे खराब है। शिक्षक ट्रेनिंग के नाम पर लंच-डिनर हो रहे हैं। इन व्यवस्था में सुधार की जिम्मेदारी निदेशालय पर है। लेकिन उच्च शिक्षा निदेशक कॉलेज कैडर से होते हैं और एलीमेंटरी शिक्षा निदेशक एचएएस से। दोनों को ही स्कूलों की फंक्शनिंग का ज्ञान नहीं होता।
करीब 70 हजार शिक्षकों वाले राज्य के सबसे बड़े शिक्षा विभाग में खाली पदों की समस्या दूसरा पहलू है। हाईकोर्ट में फटकार के बावजूद राज्य में सरकारों की इच्छा पूरा साल ट्रांसफर करने की होती है। शिक्षा विभाग में ट्रांसफर पॉलिसी के बजाय तबादला नियम बनाने की पहल किसी ने आज तक नहीं की। पहले शिक्षकों की भर्तियां बैक डोर से होती हैं और फिर ये वोट बैंक के नाम पर प्रयोग होते हैं। पीटीए भर्तियां चोर दरवाजे से नियुक्ति का सबसे बड़ा उदाहरण है। दूसरी ओर गैर शिक्षकों के पद हर साल घटाए जा रहे हैं। स्कूल प्रबंधन समिति कांसेप्ट आने के बाद तो अब स्कूलों के हेडमास्टर-प्रिंसिपल पीडब्ल्यूडी के जेई-एसडीओ या ठेकेदार की तरह हो गए हैं। इन्हें पढ़ाने या स्कूल का प्रबंधन देने के अलावा स्कूलों में हो रहे भवन निर्माण का काम भी देखना होता है। गैर शिक्षक कर्मचारी न होने से डाक, रिकार्ड, लाइब्रेरी से लेकर मिड डे मील, आरटीई और चुनावी ड्यूटी आदि सभी काम शिक्षकों के सिर पर हैं। हालांकि, इनका पढ़ाई से कोई लेना देना नहीं है। हम केंद्र सरकार से धन लेने के लिए केंद्रीय स्कीमों को आधे अधूरे लागू कर वाहवाही बटोरने के रास्ते पर हैं और ये रास्ता ज्यादा लंबा नहीं है।
(लेखक हिमाचल शिक्षा विभाग में 37 साल सेवारत रहे। इस दौरान 6 साल तक राजकीय अध्यापक संघ के अध्यक्ष और अखिल भारतीय माध्यमिक शिक्षक महासंघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य भी रहे।)

इनसेट
क्या कहते हैं राजनीतिक दल?
(1)
नए स्कूल खोले और खाली पद भी भरे : सुक्खू
कांग्रेस अध्यक्ष सुखविंद्र सुक्खू का कहना है कि कांग्रेस सरकार शिक्षा क्षेत्र के प्रति संजीदा है। कांग्रेस सरकार ने चुनावी वादे को पूरा करते हुए पीटीए शिक्षकों की नौकरी को सुरक्षित किया। नए स्कूल-कॉलेज खोले ताकि लोगों को सुविधा मिले। खाली पदों को भरने के लिए ट्राइबल और दुर्गम क्षेत्रों के लिए एक नई पॉलिसी लाई। उठाए गए इन कदमों का रिजल्ट सामने आने में थोड़ा वक्त लगेगा।
(2)
गुणवत्ता सुधारने को बनाई थी नई नीति : सत्ती
भाजपा अध्यक्ष सतपाल सत्ती कहते हैं कि पूर्व भाजपा सरकार ने सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता सुधारने के लिए ही ये नीति बनाई थी कि नया स्कूल किन मानकों के तहत खुलेगा। जहां छात्र नहीं थे, उन स्कूलों को वहां के लोगों की सहमति से बंद किया गया, ताकि स्टाफ कहीं और प्रयोग हो सके। लेकिन वर्तमान सरकार ने सुधार के इन कदमों को पीछे खींचकर नए स्कूल खोले और इनमें अब बच्चे नहीं हैं।

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