व्यापार और रौनक लील गई आपदा

जानकीचट्टी। जानकीचट्टी में आपदा के बाद से पसरा सन्नाटा अभी तक दूर नहीं हो पाया है।
यहां से यमुनोत्री धाम का पांच किलोमीटर रास्ता पैदल हैं। यहां करीब 375 दुकानें तथा होटल ढाबों में से केवल आठ ढाबे ही इस समय आबाद हैं। यहां गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ की तरह तो आपदा में कहर नहीं बरपा, सिर्फ तीन स्थानों पर भूस्खलन को नियंत्रित न कर पाने तथा यातायात बहाली में पूरे संसाधन नहीं झोंक पाने के कारण यह स्थिति पैदा हुई। छह माह में वर्षभर की जरूरत की कमाई करने वाले देहरादून, टिहरी, नेपाल तथा उत्तरकाशी गंगा घाटी से आने वाले कारोबारी इस बार संकट में हैं। कमाई करना तो दूर ये लोग मकान-दुकान का एडवांस किराया फंसाकर घर लौट चुके हैं। घोड़े-खच्चर और डंडी-कंडी से यात्रियों को यमुनोत्री छोड़ने वाले व्यवसायी अब मजदूरी करने के लिए मजबूर हैं।

केस-1
कुरोली बाड़ागड्डी के राजपाल, गढ़वालगाड के कल्याण सिंह, मसाल गांव के त्रेपन सिंह ने बीफ गांव वालों से जानकीचट्टी में 40 हजार रुपये महीना किराए पर जमीन लेकर ढाबे खोले थे। ये 26 सालों से यहां आकर इसी तरह कारोबार करते हैं, लेकिन इस बार किराया तथा दुकानों में भरे गए सामान की उधारी भी नहीं चुका पाए।

केस-2
आठ सालों से नेपाल से आकर जानकीचट्टी में होटल किराए पर चलाने वाले टीका सिंह ने 11 लाख में दो होटल लिए थे। होटल मालिकों को साढ़े तीन लाख एडवांस दिया था। अब कारोबार चौपट हो चुका है। होटल मालिकों ने बाकी पैसा माफ कर दिया है।

केस-3
खरसाली के भरत सिंह, बीफ गांव के बालमू, दुर्गीलाल, चंद्रमोहन, श्याम सिंह और विजय सिंह के परिवारों की आजीविका घोड़ा-खच्चर चलाने पर टिकी थी। यात्रा ठप होने पर अब ये मनरेगा में मजदूरी कर परिवार का पेट पाल रहे हैं।

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