
शिमला। हिमाचल प्रदेश में वन अधिकार कानून 2006 प्रदेश के विकास में बाधा बनता जा रहा है। केंद्र सरकार ने इसके लिए पंचायत स्तर की बजाय अब गांव स्तर पर कमेटियों के गठन का फैसला लिया है। इस फैसले के तहत प्रदेश के 21 हजार राजस्व गांवों में कमेटियों का गठन करना होगा। इन कमेटियों से अनापत्ति पत्र लेने के बाद ही क्षेत्र से सड़क निर्माण, पाइप बिछाने, बिजली की लाइनें बिछाने का काम हो सकेगा। कमेटी के समक्ष अपील करने की अवधि भी 90 दिन की रखी है। इस अवधि तक प्रोजेक्टों को शुरू करने में विभागों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।
हिमाचल में पहले जनजातीय क्षेत्रों मेें ही यह एक्ट लागू किया जाता था, लेकिन केंद्र सरकार के निर्देशों के बाद इसे पूरे प्रदेश में लागू कर दिया है। पूर्व सरकार के समय में 2012 में इसे तत्कालीन सरकार के मंत्रिमंडल ने इसे मंजूरी दी थी। इसके बाद कांग्रेस ने सत्ता में आने के बाद पंचायत स्तर पर कमेटियों का गठन कर दिया। अब केंद्र ने इसके लिए गांव स्तर पर कमेटियां बनाने के लिए कहा है। केंद्र के पास कई प्रोजेक्ट पंचायत कमेटियों की मंजूरी लेने के बाद भेजे तो केंद्र ने इन्हें रिजेक्ट किया और ग्रामीण स्तर पर कमेटियों का गठन किया है। प्रदेश में इस योजना के तहत 571 पंचायतों में कमेटियों का गठन किया जा चुका है। अब विकास कार्यों को गति देने के लिए हर गांव में कमेटी का गठन करना होगा। इसके बाद ही विकास कार्यों के लिए ग्रामीण कमेटियों से अनापत्ति पत्र मिल सकेंगे।
मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव और जनजातीय आयुक्त वीसी फारका ने कहा कि विकास कार्यों पर इसका प्रभाव नहीं है। केंद्र ने गांव में कमेटियां बनाने के लिए कहा है, संबंधित विभाग को कमेटियां बनाने के निर्देश दे दिए हैं।
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पंचायत स्तर पर 571 कमेटियां बना चुकी है सरकार
प्रदेश में एक्ट को लागू करने के लिए अभी तक पंचायत स्तर पर 571 कमेटियों का गठन किया जा चुका है। इसमें कुल्लू में 90, मंडी में 149, शिमला में 148, चंबा में 116, बिलासपुर में 18 और हमीरपुर में छह पंचायतों में कमेटियों का निर्माण किया जा चुका है।
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50 फीसदी वयस्कों में से करना होगा गठन
गांव में बनने वाली कमेटियों में वयस्कों की जनसंख्या के पचास फीसदी होनी चाहिए। इसमें 18 साल के कम आयु के लोगों को सदस्य नहीं बनाया जा सकेगा। इन्हें छोड़कर जितनी जनसंख्या होगी, उनके पचास फीसदी लोगों को शामिल करते हुए कमेटी बनानी होगी।
