
शिमला। लोक निर्माण विभाग के एक दिहाड़ीदार को नियमित करने के मामले में लापरवाही बरतने वाले अधिकारी के खिलाफ हाईकोर्ट ने अनुशासनात्मक कार्रवाई के आदेश दिए हैं। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि विभाग का संबंधित अधिकारी अगर अपने विवेक का कानून के दायरे में इस्तेमाल करता तो प्रार्थी को अपने अधिकार के लिए बेवजह मुकदमेबाजी में न पड़ना पड़ता। श्रम न्यायालय ने प्रार्थी के हक में फैसला देते हुए सेवा बहाली के साथ सारे वित्तीय लाभ अदा करने के आदेश दिए थे, परंतु विभाग ने इस फैसले को हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी। विभाग ने जब पॉलिसी के मुताबिक प्रार्थी को नियमित नहीं किया तो उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने प्रार्थी को 23 अगस्त 2002 से नियमित करने के आदेश पारित किए। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश एएम खानविलकर और न्यायाधीश कुलदीप सिंह की खंडपीठ ने प्रार्थी विपता नंद की दायर याचिका में पारित किए।
शमशानघाट की भूमि पर टिप्पणी से इनकार
शिमला। प्रदेश हाईकोर्ट ने शमशान घाट के लिए भूमि का चयन करने के जिलाधीश सोलन के फैसले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि जिलाधीश सोलन के इस फैसले पर अदालत कोई फेरबदल करने के लिए कानूनी तौर पर बाध्य नहीं है। अदालत ने यह आदेश जुंडला गाँव के निवासियों की जनहित में मुख्य न्यायाधीश के नाम लिखे गए पत्र पर संज्ञान लेने वाली याचिका पर पारित किए। प्रार्थियों के अनुसार शमशान घाट बनाने के लिए जिस भूमि का चयन जिलाधीश सोलन ने किया है वह गलत है।
