यहां नहीं जलता रावण का पुतला

बैजनाथ (कांगड़ा)। पूरे भारत वर्ष में दशहरे का इंतजार हर व्यक्ति को बेसब्री से रहता है, लेकिन बैजनाथ में इस त्योहार को मनाने की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है। रावण की तपोस्थली के नाम से विश्व प्रसिद्ध इस नगरी में दशहरा मनाने पर किसी प्रकार की पाबंदी नहीं है। लेकिन शिव के परम भक्त रावण व उसके भाइयों मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले जलाना भगवान शिव को रास नहीं आता है।
ऐसा नहीं है कि बैजनाथ में कभी भी दशहरा नहीं मनाया गया मगर जिस किसी भी व्यक्ति ने दशहरा उत्सव मनाने में अपना योगदान दिया, उसी के साथ भीषण दुर्घटना हुई और यहां तक की अकाल मौत तक का सामना करना पड़ा। पिछले 100 वर्षों से अधिक समय से यहां पर दशहरा नहीं मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रावण ने शिव नगरी में तपस्या की थी और शिव भगवान को प्रसन्न करने के उद्देश्य से मंदिर के समीप स्थित हवन कुंड में अपने नौ सिरों की आहुति दे डाली थी। मान्यता के अनुसार जब रावण ने अपने नौ सिरों की आहुति दे डाली तो दसवें सिर की आहुति भी देने लगा, यह सब देखकर देवता घबरा गए कि रावण ने दसवें सिर की आहुति भी दे डाली तो उसे रुद्र पदवी प्राप्त हो जाएगी और अजर, अमर तथा अजय हो जाएगा। इस पर भगवान शिव प्रकट हुए और रावण का हाथ पकड़ लिया व उसके नौ सिरों को भी जोड़ दिया और भगवान शिव यहां श्री वैद्यनाथ कहलाए। मंदिर पुजारी सुरिंद्र आचार्य के अनुसार बीच के वर्षों में लोगों ने दशहरा मनाने का निर्णय लिया था, लेकिन भगवान को यह सब रास नहीं आया।

अकाल मौत का शिकार हुए आयोजक
सत्तर के दशक में कस्बे के लोगों ने दशहरा मनाने का मन बनाया और शिव मंदिर के समीप बड़े ग्राउंड में रावण व उसके भाइयों के विशाल पुतले जलाए। कहा जाता है कि आयोजन से जुडे़ लोगों पर लगातार तीन वर्ष तक मुसीबतें आती रहीं और तीन लोगों को अचानक घटित दुर्घटनाओं में मौत हो गई। तब से एक मर्तबा फिर से दशहरा मनाने का सिलसिला बंद करना पड़ा।

Related posts