
हल्द्वानी। हल्द्वानी में अपने जीवन को समाप्त करने वाले भाई-बहन समाज और सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बड़ा सवाल छोड़ गए हैं। क्या उनकी बीमारी और उस पर आने वाला खर्च इतना था कि भाई-बहन को खुदकुशी पर मजबूर होना पड़ा। सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाएं अगर आम लोगों की पहुंच तक और कारगर होती तो दो जिंदगी बच सकती थीं। सुसाइड नोट में भाई-बहन के लिखे अंतिम वाक्य तो यही बताते हैं कि बीमारी से लड़ने की जगह उन्हाेंने मौत को चुनना बेहतर समझा। कॉस्मेटिक सर्जरी के दौर में बहन इरावती यह मान बैठी थी कि उसके झुलसे चेहरे का इतना मंहगा इलाज उसका भाई नहीं करा सकेगा। वहीं साथ में आत्महत्या करने वाला छोटा भाई अमरनाथ भी मान रहा था निजी स्वास्थ्य सेवाएं इतनी महंगी हैं जिनका बोझ बड़ा भाई कब तक उठाएगा।
इरावती का कुछ साल पहले हादसे में एक तरफ का चेहरा बुरी तरह से झुलस गया था। इरावती के झुलसे चेहरे को पहले जैसा कराने के लिए उसके बड़े भाई विश्वनाथ ने लाखों रुपया खर्च किए लेकिन इरावती का ठीक नहीं हो सका। बांग्ला भाषा में लिखे खत में अमरनाथ और इरावती ने अपने बड़े भाई के लिए यही लिखा कि अब हम आप पर बोझ नहीं बनना चाहते हैं। आप पर सालों से बोझ बने थे। आपने हमारी बीमारी में लाखों रुपया खर्च किया और आगे भी लगाएंगे लेकिन अब आपके बच्चे भी बड़े हो गए हैं।
एक परिवार में दो बीमारों का लंबा इलाज सचमुच किसी मुसीबत से कम नहीं होगा। ऐसे में बड़े भाई का दर्द ने शायद भाई-बहन को इस कदम को उठाने पर मजबूर कर दिया। खत में दोनों ने यह भी लिखा कि दिल्ली से निकल कर वे हरिद्वार गए थे। हरिद्वार में उन्हाेंने अपने अंतिम संस्कार से जुड़े क्रियाकर्म कर दिए हैं। अब आपको अंतिम संस्कार भी नहीं करना पड़ेगा। पत्र से साफ है कि दोनों ने मौत को गले लगाने का फैसला कठोर मन से लिया है। पत्र में उन्होंने बड़े भाई और भाभी से कहा कि हमें माफ करना। मौत के जिम्मेदार हम स्वयं है। बांग्ला भाषा का खत एक सिपाही ने पढ़ा था।
