
सरकाघाट (मंडी)। समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपने पुरखाें से मिली विरासत को जिंदा रखने का जज्बा कायम रखेे हुए हैं। इसे उन्होंने मनोरंजन के साथ आधुनिकता का जामा पहना कर अपनी रोजी रोटी का भी जरिया बना रखा है। इसी प्रकार की एक मिसाल क्षेत्र की हरि बैहना पंचायत के नाल्टा सरसेहड़ा निवासी कुम्हार कृष्ण चंद ने कायम की है। तीन बेटियों और एक बेटे के पिता कृष्ण चंद को मिट्टी के घड़े, बर्तन, सुराहियां और खिलौने बनाने की कला अपने पुरखों से विरासत में मिली है।
स्थानीय राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला पौंटा से दसवीं पास 59 वर्षीय कृष्ण चंद का कहना है कि बचपन में जब वह अपने दादा और पिता को मिट्टी को खोद कर लाने और उसे कूट कर नर्म बना कर चाक घड़े बनाते देखते थे तो उन्हें भी इस कला को अपनाने का शौक पैदा हुआ। हालांकि उस जमाने में दसवीं पास व्यक्ति को आसानी से सरकारी नौकरी मिल जाती थी, लेकिन उनका ध्येय अपनी पुरखों की कला को जीवंत रखना था।
कृष्ण चंद कहते हैं कि गर्मियां शुरू होते ही उनके बनाए घड़ों की मांग बढ़ जाती है और इस कला के माध्यम से होने वाली आय से उन्होंने अपनी तीन बेटियों को कालेज की शिक्षा देकर उनका विवाह करवाया तथा बेटे को भी एमबीए की पढ़ाई करवा कर रोजगार पर लगाया। क्षेत्र के जाने माने आयुर्वेदाचार्य डा. विजय कुमार का कहना है कि गर्मियों में मिट्टी के घड़े का जल शीतल होने के साथ-साथ स्वास्थ्य वर्धक भी होता है और अनेक बीमारियों की रोकथाम के लिए गुणकारी होता है।
