
उत्तरकाशी। मंदिरों की नगरी उत्तरकाशी में भी अजीब खामोशी छाई है। मंदिरों में पूजा-अर्चना तो हो रही है, लेकिन देशी-विदेशी यात्री नहीं दिख रही है। स्थानीय लोग जरूर मंदिराें में जरूर पहुंच रहे हैं। हालांकि इनकी संख्या सीमित ही है। वह सुख, समृद्धि और शांति की कामना के बजाय कुदरत के कहर से अपने घरों को सलामत रखने की मन्नतें मांग रहे हैं।
17 दिन पहले जो मंदिर यात्रियों से अटे रहते थे। वहां इन दिनों वीरानी छाई है। पुजारी श्रद्धालुओं की राह ताक रहे हैं। नगर में अब घंटे-घड़ियाल की आवाज भी कम सुनाई देती है। मंगलवार सुबह जब मैं प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर पहुंचा तो यहां सन्नाटा छा रखा था। मंदिर के पुजारी बाबा विश्वनाथ की पूजा में लीन थे। मैं भी दर्शन करके इसी मंदिर परिसर में विद्यमान शक्ति मंदिर पहुंचा। यहां इक्का-दुक्का श्रद्धालु शक्ति के त्रिशूल की परिक्रमा कर रहे थे। मैंने मंदिर के पुजारी मुरारीलाल भट्ट से पूछा कि आजकल कितने श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं, तो उन्होंने बताया कि 5 से 10 प्रतिशत श्रद्धालु ही प्रतिदिन मंदिर में पहुंच रहे हैं। इतनी कम संख्या सन 1970 में देखने को मिलती थी। कारण पूछा तो बताया कि उत्तराखंड में हुई जनहानि, भूमि हानि तथा भवन हानि ने श्रद्धालुआें को इतना दुख दे दिया कि वह मानसिक तनाव में आ गए हैं। जो इक्का-दुक्का स्थानीय श्रद्धालु मंदिर पहुुंच भी रहे हैं, वह सिर्फ यही कामना कर रहे हैं कि भगवान इस बरसात में मेरे घर को सुरक्षित रखना। इसके बाद मैं बाडाहाट स्थित कंडार देवता मंदिर में पहुंचा। यहां भी पूरा मंदिर परिसर खाली है। मंदिर के पुजारी श्रद्धालुओं की राह ताक रहे थे। 16 व 17 जून को आई आपदा से उत्तरकाशी के सभी मंदिराें के यही हाल है। कभी सिर्फ घंटे-घड़ियाल की आवाज से भक्ति मय होने वाली उत्तरकाशी नगर में अब घंटे-घड़ियाल की आवाज भी कम ही सुनाई दे रही है।
