बीमारी के बावजूद मानव सेवा में जुटीं शोभा बहन

धरमघर/बागेश्वर। हिमदर्शन कुटीर की शोभा बहन सेवा, संकल्प और सहनशीलता की मिसाल हैं। उन्होंने जीवन भर तो संघर्ष किए ही अब उम्र के आखिरी के पड़ाव में बीमारी के बावजूद मानव सेवा में जुटी हैं। धरमघर क्षेत्र की महिलाओं के उत्थान में उनकी प्रमुख भूमिका रही है।
18 अप्रैल 1942 को भिकियासैंण ब्लाक के धनोली, सिनौड़ा गांव में गांधीवादी मोहनलाल विद्यार्थी और गंगादेवी के घर जन्मी शोभा बहन अपनी तीन बहनों के साथ 1953 में कौसानी के लक्ष्मी आश्रम में पहुंचीं थीं। यहां समाज सेविका सरला बहन के व्यवहार और विचारों ने उन पर ऐसा प्रभाव डाला कि उन्होंने अपना पूरा जीवन मानवता को समर्पित करने की ठान ली। प्राथमिक शिक्षा लेने के बाद उन्होंने कताई-बुनाई शुरू कर दी। इंदौर में खादी के प्रशिक्षण के साथ उन्हाेंने विनोवा भावे के साथ भूदान यात्राओं में भाग लिया। साथ ही 1961 से कौसानी में सरला बहन की देखरेख में कई सामाजिक कार्य किए। 1969 में वे आदिवासियों की सेवा के लिए बोध गया के आदिवासी इलाकों में चली गईं। 1972 में उन्होंने सरला बहन के साथ चंबल के दस्यु बहुल क्षेत्र में जातिवाद से ग्रसित क्षेत्रों में जनजागरण अभियान चलाया। 1974 में मुरैना जिले के वर्धा क्षेत्र में जातीय हिंसा को रोकने का प्रयास किया। चंबल क्षेत्र में शराब बंदी, महिला शिक्षा सहित तमाम कार्य किए। 1974 में स्वास्थ्य बिगड़ने पर वह इलाज के लिए हरियाणा के पानीपत गई। 1976 में सरला बहन की सहमति से वह धरमघर के हिमदर्शन कुटीर में पर्वतीय पर्यावरण संरक्षण समिति का संचालन करने लगीं। क्षेत्र में नशा उन्मूलन और महिला उत्थान की दिशा में उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किए। समाज सेवा के लिए उन्हें प्रेम भाई पुरस्कार और पर्वत गौरव पुरस्कार मिल चुके हैं। उम्र के आखिरी पड़ाव में वे बीमारी से जूझ रही हैं लेकिन मानव सेवा का जज्बा अब भी कम नहीं हुआ है।

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