
मणिमहेश (चंबा)। ऐतिहासिक मणिमहेश यात्रा के दौरान प्राकृतिक आपदा से निपटने के सरकारी उपाय नाममात्र हैं। हड़सर से लेकर गौरीकुंड तक रास्ते में भूस्खलन का खतरा है। भारी बारिश तथा बादल फटने की घटनाओं की संभावना भी बनी रहती है। केदारनाथ में हुई त्रासदी के चलते इस यात्रा की सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हड़सर से लेकर डलझील तक के पैदल रास्ते में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि किसी प्रकार की प्राकृतिक आपदा के समय जल्द से जल्द सहायता मुहैया करवाई जा सके। हैलीपैड की व्यवस्था भी करब 12 किमी गौरीकुंड में है। बीच में 6 किमी की दूरी धनछो में पर्वतारोहण संस्थान की ओर से कैंप लगाए गए हैं। प्रशासन इस संस्थान पर ही निर्भर है। इस क्षेत्र में श्रद्धालुओं के लिए अपनों से संपर्क करने का एकमात्र साधन डब्ल्यूएलएल फोन हैं, जो दुकानदारों ने लगा रखे हैं। इस सेवा के दाम भी कई गुणा अधिक वसूले जाते हैं।
भूस्खलन का सबसे ज्यादा खतरा हड़सर से धनछो के रास्ते में है। यहां पहाड़ी से मलबा तथा पत्थर गिरते हैं और फिसलन भरे रास्ते से खाई में गिरने का भी खतरा बना हुआ है। इसके अलावा यहां वर्ष 1995 की बाढ़ के बाद से सुरक्षित रास्ता बह चुका है और मौजूदा समय में मणिमहेश नाले के साथ ही बने ट्रैक पर चलना पड़ता है। करीब एक किमी तक का रास्ता नाले के खतरे की जद में है। वहीं, धनछो से गौरीकुंड के रास्ते में घार चलने तथा ग्लेशियर से गिरने वाले पत्थरों से खतरा बना हुआ है। उपायुक्त संदीप कदम ने बताया कि प्राकृतिक आपदा से बचने के लिए पर्वतारोहण संस्थान के सहयोग से यात्रा के दौरान जागरूकता अभियन चलाया जाएगा। फिलहाल, ऐसा कोई खतरा नहीं दिख रहा। प्रशासन सतर्क है।
