प्याज की कीमत क्या बढ़ी पौधों की खपत में भी इजाफा

रानीखेत। प्याज का बाजार भाव बढ़ने से इस बार प्याज के पौध की खपत बढ़ गई है। प्याज बोना बंद कर चुके लोगों ने दोबारा खेती शुरू कर दी है। खपत बढ़ने से गगास घाटी के किसानों को डिमांड पूरी करना कठिन हो रहा है। दरअसल इस बार अतिवृष्टि के चलते कई क्षेत्रों में नहरें क्षतिग्रस्त हो गई थी। जिस कारण किसानों ने कम नर्सरी बोई थी। गगास के प्याज के पौध अल्मोड़ा, बागेश्वर और पिथौरागढ़ जिले के अलावा गढ़वाल से लगे इलाकों में भी खूब पसंद किया जाते हैं। इस क्षेत्र के काश्तकार सीजन में दो से तीन लाख रुपये तक की पौध बेच देते हैं।
शहर से 19 किमी की दूरी पर स्थित गगास घाटी के मकड़ौं, मंगचौड़ा सहित कई इलाकों में व्यापक मात्रा में प्याज की पौध उगाई जाती है। अगस्त और सितंबर में काश्तकार एक से लेकर पांच नाली तक की भूमि में प्याज के बीज बोते हैं। निराई, गुड़ाई और खरपतवार निकालने के बाद नवंबर की 15 तारीख तक पौध तैयार हो जाते हैं। ग्रामीण प्याज की पौध सोमेश्वर, गरुड़, बागेश्वर, हवालबाग, अल्मोड़ा, रानीखेत, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, चौखुटिया मुनस्यारी, चंपावत, डीडीहाट, धारचूला आदि क्षेत्रों में बेचते हैं। मकड़ों के काश्तकार राजेंद्र बिष्ट, मंगचौड़ा के खुशाल सिंह ने बताया कि प्याज के दाम बाजार में 100 रुपये किलो तक पहुंच गए। जिस कारण अचानक पौध की डिमांड बढ़ गई है। प्याज हाथों हाथ निकल जा रहा है। वर्षों से प्याज का उत्पादन बंद कर चुके कई काश्तकारों ने इस बार अपनी बंजरभूमि खोदकर प्याज की खेती शुरू कर दी है।
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स्वयं बीज तैयार करते हैं गगास घाटी के काश्तकार
रानीखेत। गगास घाटी के काश्तकार स्वयं प्याज का बीज तैयार करते हैं। इस प्याज की खासियत यह है कि रोपाई के बाद पौध के ऊपर से फूल नहीं आता। गांठ भी बड़ी निकलती है। फूल वाली पौध ठीक नहीं मानी जाती। काश्तकार राजेंद्र बिष्ट ने बताया कि उद्यान विभाग की तरफ से पर्याप्त मदद किसानों को नहीं मिल पाती।
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मकड़ौं, मंगचौड़ा के प्याज के नाम पर कई बार ठगे जाते हैं ग्राहक
रानीखेत। गगास घाटी की प्याज की पौध के नाम पर कई क्षेत्रों में लोग घाटी का नाम लेकर गलत प्याज की पौध तक बेच देते हैं। बागेश्वर, गरुड़, रानीखेत सहित कई स्थानों में इस तरह के मामले प्रकाश में आ चुके हैं। काश्तकार खुशाल सिंह ने बताया कि वह वजन के आधार पर प्याज की पौध को पहचान लेते हैं।

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